Thursday, 4 June 2026

विश्व पर्यावरण दिवस: एक दिन का उत्सव या जीवनभर का संकल्प?

विश्व पर्यावरण दिवस: एक दिन का उत्सव या जीवनभर का संकल्प?
5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस है। सभी को इस महत्वपूर्ण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
विश्व पर्यावरण दिवस की शुरुआत वर्ष 1972 में हुई थी, जब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पर्यावरण संरक्षण के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से इसे स्थापित किया। तब से हर वर्ष 5 जून को दुनिया भर के देशों में यह दिवस मनाया जाता है। कहीं वृक्षारोपण होता है, कहीं जागरूकता रैलियाँ निकलती हैं, कहीं कार्यशालाएँ आयोजित होती हैं और कहीं बड़े-बड़े सम्मेलनों में पर्यावरण संरक्षण पर चर्चा होती है।
लेकिन एक प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है—क्या केवल एक दिन पर्यावरण दिवस मना लेने से पर्यावरण सुरक्षित हो जाएगा?
एक गांव की कहानी
एक गांव के बाहर कभी घना जंगल हुआ करता था। जंगल के बीच से एक छोटी नदी बहती थी। पक्षियों का कलरव, पेड़ों की छांव और स्वच्छ हवा वहां की पहचान थी। गांव के बुजुर्ग बताते थे कि गर्मियों में भी नदी का पानी कभी नहीं सूखता था और खेतों में भरपूर उत्पादन होता था।
समय बदला। विकास के नाम पर सड़कें बनीं, खदानें खुलीं, उद्योग स्थापित हुए और धीरे-धीरे जंगल कटने लगे। कुछ वर्षों में जंगल की जगह कंक्रीट की इमारतों ने ले ली। नदी सिकुड़ती गई और भूजल स्तर नीचे चला गया।
हर वर्ष 5 जून को गांव में भी पर्यावरण दिवस मनाया जाता था। मंच सजता था, भाषण होते थे, कुछ पौधे लगाए जाते थे और फिर सब अपने-अपने घर चले जाते थे।
एक दिन गांव के एक बुजुर्ग ने सभा में खड़े होकर पूछा—
"हम हर साल पौधे लगाते हैं, लेकिन क्या कभी यह भी देखा कि पिछले साल लगाए गए पौधों में कितने जीवित हैं? हम पर्यावरण बचाने की बातें करते हैं, लेकिन क्या अपने व्यवहार में कोई बदलाव लाते हैं?"
सभा में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया।
बुजुर्ग ने आगे कहा—
"पर्यावरण केवल पेड़ लगाने से नहीं बचेगा। पर्यावरण तब बचेगा जब हम पेड़ों को बड़ा होने तक संभालेंगे। जब हम नदियों को प्रदूषित होने से बचाएंगे। जब हम जरूरत से ज्यादा उपभोग करना छोड़ेंगे। जब हम पानी, बिजली और संसाधनों का संयमित उपयोग करेंगे।"
उनकी बात लोगों के दिल को छू गई।
बदलाव की शुरुआत
उस वर्ष गांव ने एक नया संकल्प लिया।
उन्होंने तय किया कि केवल पौधे नहीं लगाएंगे, बल्कि उनकी जिम्मेदारी भी लेंगे। हर परिवार को कुछ पौधों की देखभाल का दायित्व दिया गया। वर्षा जल संचयन शुरू किया गया। गांव के तालाब और नदी की सफाई की गई। प्लास्टिक का उपयोग कम किया गया।
लोगों ने यह भी समझा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। सरकार नीतियां बना सकती है, लेकिन धरती को बचाने का काम समाज और नागरिकों की भागीदारी से ही संभव है।
धीरे-धीरे गांव में हरियाली लौटने लगी। पक्षी वापस आने लगे। भूजल स्तर सुधरने लगा और लोगों के मन में भी प्रकृति के प्रति अपनापन बढ़ने लगा।
आज की आवश्यकता
आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, अनियमित मानसून, जल संकट और प्रदूषण जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे समय में हमें केवल पर्यावरण दिवस मनाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
हमें यह समझना होगा कि—
पेड़ लगाने के साथ-साथ उन्हें बचाना भी जरूरी है।
नदियों, तालाबों और जलस्रोतों का संरक्षण करना होगा।
पानी की बर्बादी रोकनी होगी।
प्रदूषण और अनावश्यक धुएं को कम करना होगा।
जरूरत से ज्यादा उपभोग की आदत छोड़नी होगी।
पुनः उपयोग (Reuse) और पुनर्चक्रण (Recycle) को अपनाना होगा।
स्थानीय संसाधनों और प्रकृति आधारित जीवनशैली को बढ़ावा देना होगा।
निष्कर्ष
विश्व पर्यावरण दिवस केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह हमें याद दिलाने का अवसर है कि प्रकृति के बिना मानव सभ्यता का अस्तित्व संभव नहीं है।
यदि हम सचमुच आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा, निर्मल जल और हरियाली से भरी धरती देना चाहते हैं, तो पर्यावरण संरक्षण को एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनआंदोलन बनाना होगा।
आइए इस 5 जून को केवल पौधा लगाने का नहीं, बल्कि प्रकृति को बचाने का संकल्प लें।
"पर्यावरण दिवस मनाना अच्छी बात है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है पर्यावरण को अपने जीवन का हिस्सा बनाना। पेड़ केवल लगाएं नहीं, उन्हें बचाएं भी; पानी केवल उपयोग न करें, उसे संजोएं भी; और प्रकृति से केवल लें नहीं, उसे लौटाएं भी।"
— संजय शर्मा
विश्व पर्यावरण दिवस, 5 जून 🌿🌍

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