Sunday, 16 August 2026

‘अदहन’: पूर्वांचल की रसोई में बसा एक पारंपरिक शब्द

‘अदहन’: पूर्वांचल की रसोई में बसा एक पारंपरिक शब्द
“दाल के लिए अदहन चढ़ा दो।”
पूर्वांचल के गांवों में कभी यह वाक्य घर की रसोई में बहुत सहजता से सुनाई देता था। आज भी उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के कई ग्रामीण इलाकों में ‘अदहन’ शब्द पारंपरिक भोजन, घरेलू जीवन और स्थानीय बोली की एक जीवंत पहचान के रूप में सुनने को मिलता है।
‘अदहन’ सामान्यतः उस पानी को कहा जाता है जिसे दाल पकाने से पहले चूल्हे पर गरम करने के लिए चढ़ाया जाता है। मिट्टी के चूल्हे पर लकड़ी, उपले या कृषि-अवशेषों की आग जलती थी और उसके ऊपर पानी से भरी हांडी या पतीली रख दी जाती थी। पानी गर्म होने के बाद उसमें दाल डालकर पकाई जाती थी।
अदहन केवल पानी नहीं, एक परंपरा है
आधुनिक रसोई में गैस चूल्हे, प्रेशर कुकर और इंडक्शन ने भोजन पकाने की प्रक्रिया को काफी बदल दिया है। लेकिन पहले ग्रामीण परिवारों में दाल पकाना भी एक पारंपरिक प्रक्रिया हुआ करती थी।
सुबह या दोपहर के भोजन की तैयारी शुरू होती तो सबसे पहले चूल्हा जलाया जाता। घर की महिलाएं अनाज और दाल की तैयारी करतीं और साथ ही कहा जाता—
“अदहन चढ़ गया क्या?”
इस छोटे-से वाक्य में भोजन पकाने की पूरी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण छिपा होता था।
मिट्टी के चूल्हे से जुड़ी यादें
अदहन का संबंध केवल दाल से नहीं था, बल्कि वह उस समय की पूरी ग्रामीण रसोई का हिस्सा था। मिट्टी के चूल्हे, लकड़ी या उपले की आग, पीतल या पीतल-मिश्रित बर्तनों, लोहे की कड़ाही और मिट्टी की हांडी—इन सबके बीच ‘अदहन’ शब्द का अपना स्थान था।
दाल के लिए पानी गर्म होने में समय लगता था। इस दौरान घर के दूसरे काम भी चलते रहते थे। भोजन बनाना केवल एक घरेलू काम नहीं था, बल्कि परिवार और पड़ोस के सामाजिक जीवन का भी हिस्सा था।
स्थानीय भाषा में छिपी संस्कृति
‘अदहन’ जैसे शब्द यह बताते हैं कि भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति का दस्तावेज भी है।
किसी क्षेत्र की बोली में ऐसे अनेक शब्द मिलते हैं जिनका सीधा संबंध वहां के भोजन, खेती, पशुपालन, मौसम, कृषि उपकरणों और पारंपरिक जीवन से होता है।
पूर्वांचल की बोलियों—जैसे भोजपुरी, अवधी और इनके स्थानीय रूपों—में ऐसे अनेक शब्द आज भी बुजुर्ग पीढ़ी की बातचीत में सुनाई देते हैं। इनमें से कई शब्द धीरे-धीरे दैनिक जीवन से बाहर हो रहे हैं क्योंकि उनके पीछे की जीवन-शैली भी बदल रही है।
‘अदहन’ और बदलता ग्रामीण जीवन
आज दाल बनाने में प्रेशर कुकर का प्रयोग सामान्य हो गया है। पानी अलग से चूल्हे पर गर्म करने की आवश्यकता कम हो गई है। गैस और इंडक्शन ने खाना पकाने की प्रक्रिया को तेज और सुविधाजनक बना दिया है।
इसके साथ ही पारंपरिक शब्दावली भी धीरे-धीरे कम होती जा रही है।
नई पीढ़ी के कई बच्चों को शायद यह पता भी न हो कि ‘अदहन चढ़ाना’ क्या होता है। यही कारण है कि ऐसे स्थानीय शब्दों को केवल शब्दकोश में दर्ज करना पर्याप्त नहीं है; उनके साथ जुड़ी कहानियों, स्मृतियों और जीवन-पद्धति को भी दर्ज किया जाना चाहिए।
एक शब्द, एक पूरा लोक-संसार
‘अदहन’ शब्द सुनते ही एक पूरा दृश्य आंखों के सामने उभर सकता है—गांव का घर, आंगन, मिट्टी का चूल्हा, जलती हुई लकड़ियां, ऊपर रखी पतीली, धीरे-धीरे गर्म होता पानी और पास में दाल साफ करती हुई घर की महिलाएं।
यही लोक-स्मृतियां हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं।
आज जब हम पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय खाद्य संस्कृति और ग्रामीण जीवन-पद्धति को संरक्षित करने की बात करते हैं, तब ‘अदहन’ जैसे छोटे-छोटे शब्द भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। ये शब्द हमें बताते हैं कि हमारे पूर्वज भोजन कैसे बनाते थे, किस तरह समय का उपयोग करते थे और किस प्रकार रोजमर्रा के कामों में प्रकृति और स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते थे।
शब्दों को बचाना, संस्कृति को बचाना
स्थानीय बोलियों के शब्द तेजी से बदल रहे हैं। कई शब्द केवल बुजुर्गों की स्मृति तक सीमित होते जा रहे हैं। इसलिए जरूरत है कि गांवों में प्रचलित ऐसे शब्दों का लोक-शब्दकोश तैयार किया जाए।
बुजुर्गों से बातचीत करके यह दर्ज किया जा सकता है कि किसी शब्द का क्या अर्थ था, उसका प्रयोग किस संदर्भ में होता था और उससे जुड़ी कौन-सी परंपरा या जीवन-पद्धति थी।
‘अदहन’ इसी तरह का एक छोटा-सा शब्द है, लेकिन इसके भीतर पूर्वांचल की ग्रामीण रसोई, पारंपरिक भोजन और लोक-संस्कृति की एक बड़ी कहानी छिपी है।
निष्कर्ष
समय बदलता है, तकनीक बदलती है और जीवन जीने के तरीके भी बदलते हैं। लेकिन हमारी लोकभाषा में दर्ज शब्द हमारी सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखते हैं।
‘अदहन’ केवल दाल पकाने के लिए चूल्हे पर चढ़ाया गया पानी नहीं है; यह पूर्वांचल की एक ऐसी लोक-स्मृति है जिसमें मिट्टी का चूल्हा, पारंपरिक भोजन, परिवार, श्रम और गांव का जीवन एक साथ दिखाई देता है।
इसलिए ऐसे शब्दों को याद करना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना हमारी लोक-संस्कृति को बचाए रखने की दिशा में एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कदम है।

Thursday, 13 August 2026

Co-Creating the Swaraj Learning System (SLS): A National Dialogue on Indigenous Knowledge, Community Learning and Leadership

Co-Creating the Swaraj Learning System (SLS): A National Dialogue on Indigenous Knowledge, Community Learning and Leadership
A Three-Day National Workshop at India International Centre, New Delhi
From 10 to 12 August 2026, Vaagdhara Institute, Banswara, Rajasthan, organised a three-day national workshop titled “Co-Creating the Swaraj Learning System (SLS)” at the India International Centre (IIC), New Delhi. The workshop brought together representatives of voluntary organisations and development practitioners from different parts of India who are working closely with indigenous, tribal, marginalised and economically disadvantaged communities.
The workshop created an important national platform for sharing grassroots experiences, indigenous knowledge, community practices and innovative approaches to learning and leadership. Participants came from diverse geographical and social contexts, bringing with them a rich body of knowledge and practical experience developed through years of engagement with communities.
Towards a Community-rooted Learning System
The central goal of the workshop was to co-create a reviewed and validated Swaraj Learning System (SLS)—a learning framework rooted in indigenous knowledge, wisdom, practices and community leadership, and ready for further development and wider dissemination.
The workshop focused on three broad objectives:
Review, validate and finalise the SLS framework, content pathways and pedagogical approach, ensuring academic rigour while remaining authentically grounded in indigenous knowledge and community realities.
Engage external stakeholders in co-shaping the SLS, strengthening its relevance, creating shared ownership and building a wider network of people and organisations committed to promoting its vision.
Develop a shared strategy for positioning SLS as a catalyst for indigenous knowledge documentation and community-led learning, with a roadmap for taking the initiative beyond the Rajasthan–Madhya Pradesh–Gujarat tri-junction.
Learning Through Thematic Groups
During the first two days, participants were divided into thematic groups around three interconnected areas:
Agro-ecology
Indigenous Food Systems and Health
Circular Lifestyle
Each thematic area was further divided into sub-themes, allowing participants to explore specific issues through group discussions, field experiences and knowledge sharing.
1. Agro-ecology
The Agro-ecology group explored the relationship between communities, agriculture, natural resources and ecological sustainability. Discussions included:
Land and water-use efficiency
Seeds and vegetation
Energy justice
Animal husbandry and livestock
Biodiversity
Participants shared examples from their respective regions, highlighting traditional agricultural practices, community knowledge, local biodiversity and approaches to sustainable management of land, water, seeds and livestock.
The discussions demonstrated that indigenous communities possess significant knowledge about ecological balance and resource management—knowledge that can provide valuable pathways towards climate-resilient and sustainable agriculture.
2. Indigenous Food Systems and Health
The second thematic group focused on the deep relationship between food, nutrition, culture, health and community leadership.
The key areas discussed were:
Food diversity and nutrition
Food culture and health
Food and nutrition leadership and governance
Indigenous health systems
Participants shared experiences of traditional foods, local crops, indigenous healing practices and community-based approaches to nutrition and well-being.
The discussions reinforced the understanding that food is not merely a source of nutrition. It is closely connected with culture, identity, biodiversity, livelihoods, health and community resilience.
3. Circular Lifestyle
The third group explored the concept of circular living and how traditional community practices can contribute to sustainable lifestyles.
The discussions covered:
Household-level circular living practices
Community-level living practices
Indigenous culture and self-governance
Circularity in energy management
Participants reflected on traditional systems in which resources were reused, waste was minimised and communities maintained a closer relationship with nature. Many of these practices offer valuable lessons for developing contemporary models of sustainable and circular living.
A Deeper Dialogue on Emerging Challenges
On the third day, participants came together in separate groups to discuss four cross-cutting themes:
Climate and Heat
Gender
Community Leadership and Governance
Mental Health and Happiness
These discussions helped connect indigenous knowledge and community practices with emerging social, environmental and developmental challenges.
The conversations also highlighted the importance of looking beyond conventional development indicators. Community well-being, social relationships, local leadership, cultural identity, ecological security and happiness are equally important dimensions of a meaningful and sustainable life.
An Open Space for Experience Sharing
One of the most valuable aspects of the workshop was the openness with which participants shared their experiences. People working in very different geographical and social contexts brought unique stories, practices and lessons from the field.
The discussions were not limited to theoretical presentations. Participants reflected on what is actually happening within communities, what is working, what challenges they face and how traditional knowledge can be documented and integrated into contemporary learning systems.
Subject experts and mentors listened carefully to the discussions and provided guidance throughout the process. At the end of each day, the outcomes of the thematic groups were presented and discussed in the larger group. This process helped participants learn from one another and collectively refine the ideas emerging from the workshop.
My Experience as a Participant
I was also privileged to be a participant in this national workshop and had the opportunity to share my own experiences from working with communities.
For me, one of the most important outcomes was the opportunity to listen to and learn from unique grassroots experiences from different parts of India. Although communities may live in different geographical and cultural settings, many of their challenges—and many of their traditional solutions—are remarkably interconnected.
The workshop provided an opportunity to understand how indigenous knowledge is being preserved, practised and adapted by different communities, and how these experiences can contribute to a larger learning ecosystem.
It also reaffirmed an important principle: knowledge does not exist only in institutions and classrooms; it is deeply embedded in communities, cultures, livelihoods, landscapes and everyday practices.
Swaraj Learning System: From Experience to a Shared Knowledge Platform
The Swaraj Learning System is being developed as a web-based learning and knowledge platform where experiences, indigenous knowledge, community practices, innovations and best practices from different regions can be documented, shared and made accessible to a wider audience.
The idea goes beyond creating a digital repository. SLS aims to create a living learning system in which communities, civil society organisations, practitioners, researchers, educators and other stakeholders can contribute their experiences and learn from one another.
Through collective participation, the initiative has the potential to build a large network of people and organisations working to strengthen indigenous knowledge, community-led learning and local leadership.
Building a Larger Movement of Knowledge and Learning
The three-day workshop demonstrated the power of collective learning. When people working at the grassroots come together, their experiences become a valuable source of knowledge for others.
The discussions around agro-ecology, indigenous food systems, health, circular lifestyles, climate, gender, leadership, governance and mental well-being showed that these issues cannot be addressed in isolation. They are interconnected with the way communities understand nature, manage resources, preserve culture and organise their collective lives.
The Swaraj Learning System therefore represents an opportunity to bring these diverse experiences together and transform them into a shared national learning resource rooted in indigenous wisdom and community realities.
Several distinguished guests and speakers also shared their perspectives during the programme, further enriching the dialogue and strengthening the vision of SLS.
Looking Ahead
The New Delhi workshop was not an end point; rather, it was an important step in a longer journey.
The next phase will be to consolidate the ideas, experiences and content generated through the workshop, refine the SLS framework and develop the web platform as a meaningful space for knowledge exchange and community-led learning.
The larger vision is to take the learning beyond geographical boundaries and create a national network that recognises the value of indigenous knowledge and places communities at the centre of the learning process.
Swaraj Learning System has the potential to become more than a learning platform—it can become a collective movement for recognising, documenting, validating and sharing the knowledge that already exists within communities.
The three-day national workshop in New Delhi was therefore an inspiring experience of co-creation, dialogue, collective wisdom and shared ownership—a step towards building a learning system where indigenous knowledge, community experience and local leadership are not only respected but become central to the development discourse.
From community knowledge to collective learning.
From local experiences to a national knowledge movement.
This is the promise of the Swaraj Learning System.

Friday, 31 July 2026

Exploring Vaagdhara's Knowledge Publications: Valuable Resources for Sustainable Agriculture, Nutrition, and Indigenous Wisdom

Exploring Vaagdhara's Knowledge Publications: Valuable Resources for Sustainable Agriculture, Nutrition, and Indigenous Wisdom
During the "Shaping Community-led Climate Justice Pathways" workshop organized by Vaagdhara at the India Habitat Centre, New Delhi, I had the opportunity not only to participate in insightful technical sessions but also to explore a wide range of publications developed by the organization. I brought back several of these publications for detailed reading, and my initial impressions have been highly encouraging.
What stands out about these publications is that they are rooted in years of field experience, community engagement, and research. They document indigenous knowledge, sustainable farming practices, nutrition, climate resilience, and community-led development in a manner that is practical, evidence-based, and accessible. These resources are immensely valuable not only for farmers but also for development practitioners, civil society organizations, researchers, students, and policymakers working in rural and tribal communities.
One of the first publications I explored was "Sustainable Crop Production through Natural Pest Management." This publication presents practical approaches to managing crop pests using natural and ecological methods. At a time when excessive dependence on chemical inputs is affecting soil health, biodiversity, and farmers' livelihoods, this publication offers sustainable alternatives that can help promote environmentally friendly agriculture. It is an excellent resource for organizations working closely with farming communities.
Another remarkable publication is "Nutrition-Sensitive Farming." It provides a comprehensive understanding of how agriculture can be planned not only for higher production but also for improving household nutrition. Although farmers possess rich traditional knowledge, learning from successful experiences in different regions can inspire innovation. The experiences documented from Rajasthan can provide valuable insights for farmers in states such as Chhattisgarh, enabling them to compare practices, adapt suitable approaches, and strengthen nutrition-sensitive agriculture according to local conditions.
The publication "Food Treasure of Tribal Community" is particularly impressive. It presents a scientific nutritional analysis of traditional foods consumed by tribal communities, supported by detailed data and evidence. The publication highlights that indigenous food systems are not merely part of cultural heritage but are also nutritionally rich and highly relevant for addressing present-day health and nutrition challenges. It encourages readers to appreciate traditional diets from both cultural and public health perspectives.
Another publication that immediately attracted my attention is "Successful Revival of Traditions of Circular Economy within Farming System among Indigenous Rural Communities." Although I have only had the opportunity to browse through it so far, it clearly demonstrates how indigenous farming systems have historically embraced circular economy principles through efficient resource use, recycling, and ecological balance. I look forward to studying this publication in greater detail.
Vaagdhara has also produced several other noteworthy publications, including:
Nutritive Analysis of Indigenous Traditional Food Items of Tribal Community
Learning from the Land: Using Indigenous Knowledge for Climate-Sensitive Circular Lifestyles
DAL UTSAV: Restoring Tradition, Reviving Swaraj
Jal Swaraj (Water Sovereignty) of the Indigenous Communities for the Larger World
Guardians of Heritage: Tribal Practices in Seed Conservation and Nutritional Sovereignty
These publications collectively cover a wide spectrum of themes, including indigenous food systems, seed conservation, water governance, nutrition, climate resilience, traditional ecological knowledge, and sustainable rural livelihoods. Each title reflects the richness of indigenous wisdom and demonstrates how traditional knowledge can contribute to contemporary solutions for climate change, food security, and sustainable development.
As the world searches for resilient and sustainable pathways to address climate and agricultural challenges, such publications serve as valuable repositories of knowledge. They not only preserve indigenous practices but also bridge traditional wisdom with modern research, creating opportunities for learning, adaptation, and policy innovation.
I sincerely appreciate Vaagdhara's commitment to documenting community knowledge and making it accessible to a wider audience. These publications deserve to be widely read by farmers, development professionals, academic institutions, government agencies, and anyone interested in sustainable agriculture, nutrition, climate justice, and indigenous knowledge systems.
I look forward to reading each of these publications in depth and applying the insights they offer in my own work with rural and tribal communities. They are more than books—they are valuable knowledge resources that inspire sustainable, community-led development.

बाग्धारा संस्थान के प्रकाशन: किसानों, शोधकर्ताओं और विकास कार्यकर्ताओं के लिए ज्ञान का समृद्ध भंडार

बाग्धारा संस्थान के प्रकाशन: किसानों, शोधकर्ताओं और विकास कार्यकर्ताओं के लिए ज्ञान का समृद्ध भंडार
31 जुलाई 2026 को नई दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटेट सेंटर में बाग्धारा संस्थान द्वारा आयोजित "Shaping Community-led Climate Justice Pathways" विषयक कार्यशाला में सहभागी होने का अवसर मिला। कार्यशाला के विभिन्न तकनीकी सत्रों के साथ-साथ संस्थान द्वारा प्रकाशित अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों एवं शोध प्रकाशनों को देखने और पढ़ने का भी अवसर प्राप्त हुआ। इन प्रकाशनों में से कुछ प्रतियाँ मैं अपने साथ भी लेकर आया हूँ, जिन्हें पढ़ने की शुरुआत की है।
इन प्रकाशनों का अध्ययन करते हुए यह महसूस हुआ कि बाग्धारा संस्थान ने वर्षों के सामुदायिक अनुभव, शोध और स्थानीय ज्ञान को अत्यंत व्यवस्थित रूप से दस्तावेज़ीकृत किया है। ये प्रकाशन केवल किसानों के लिए ही नहीं, बल्कि कृषि, पोषण, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन तथा आदिवासी समुदायों के साथ कार्य करने वाली संस्थाओं, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और नीति-निर्माताओं के लिए भी अत्यंत उपयोगी हैं।
सबसे पहले "प्राकृतिक कीट नियंत्रण से टिकाऊ खेती उत्पादन" पुस्तक का अध्ययन किया। यह पुस्तक प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित कीट नियंत्रण के व्यावहारिक उपायों को सरल भाषा में प्रस्तुत करती है। रासायनिक कृषि पर बढ़ती निर्भरता के बीच यह प्रकाशन टिकाऊ एवं पर्यावरण-अनुकूल खेती को बढ़ावा देने का प्रभावी माध्यम बन सकता है। किसानों के साथ कार्य करने वाली संस्थाओं के लिए भी यह एक उत्कृष्ट संदर्भ सामग्री है।
दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक "पोषण संवेदी खेती" है। इसमें पोषण आधारित कृषि की अवधारणा, उसके महत्व तथा व्यवहारिक पहलुओं को विस्तार से समझाया गया है। वास्तव में किसानों के पास पारंपरिक ज्ञान का विशाल भंडार होता है, लेकिन विभिन्न राज्यों के सफल अनुभवों का आदान-प्रदान सीखने और नवाचार को बढ़ावा देता है। यदि राजस्थान के इन अनुभवों को छत्तीसगढ़ सहित अन्य राज्यों के किसान समझेंगे, तो वे अपनी परिस्थितियों के अनुसार बेहतर एवं पोषण-केंद्रित खेती की दिशा में नए प्रयोग कर सकेंगे।
"Food Treasure of Tribal Community" शीर्षक प्रकाशन विशेष रूप से आकर्षक लगा। इसमें आदिवासी समुदायों के पारंपरिक खाद्य पदार्थों का पोषण संबंधी वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। आँकड़ों और तथ्यों के माध्यम से यह पुस्तक बताती है कि आदिवासी समाज का पारंपरिक खान-पान केवल सांस्कृतिक विरासत नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और पोषण की दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध है। यह प्रकाशन हमें आधुनिक भोजन प्रणाली के साथ-साथ पारंपरिक खाद्य संस्कृति को भी नए दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित करता है।
एक अन्य महत्वपूर्ण प्रकाशन "Successful Revival of Traditions of Circular Economy within Farming System among Indigenous Rural Communities" की अभी केवल प्रारंभिक झलक देखने का अवसर मिला है। पहली ही दृष्टि में यह स्पष्ट हो जाता है कि यह ग्रामीण एवं आदिवासी समुदायों की परंपरागत कृषि प्रणालियों, संसाधनों के पुनः उपयोग तथा सर्कुलर इकोनॉमी की अवधारणा को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। इसे विस्तार से पढ़ने की उत्सुकता है।
इसके अतिरिक्त संस्थान के अन्य प्रकाशन भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, जिनमें प्रमुख हैं—
Nutritive Analysis of Indigenous Traditional Food Items of Tribal Community
Learning from the Land: Using Indigenous Knowledge for Climate-sensitive Circular Lifestyles
DAL UTSAV: Restoring Tradition, Reviving Swaraj
Jal Swaraj (Water Sovereignty) of the Indigenous Communities for the Larger World
Guardians of Heritage: Tribal Practices in Seed Conservation and Nutritional Sovereignty
इन सभी पुस्तकों के शीर्षक ही यह संकेत देते हैं कि इनमें जल, जंगल, जमीन, बीज संरक्षण, पोषण, पारंपरिक ज्ञान, जलवायु अनुकूल जीवनशैली तथा समुदाय आधारित विकास के गहन अनुभव समाहित हैं। समय निकालकर इन सभी प्रकाशनों का अध्ययन अवश्य करना चाहूँगा।
आज जब कृषि, पोषण और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियाँ हमारे सामने गंभीर रूप से उपस्थित हैं, तब ऐसे प्रकाशन केवल अध्ययन सामग्री नहीं, बल्कि व्यवहारिक परिवर्तन के मार्गदर्शक हैं। विशेष रूप से वे संस्थाएँ जो किसानों, आदिवासी समुदायों और ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्य कर रही हैं, उनके लिए यह साहित्य अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
बाग्धारा संस्थान का यह प्रयास न केवल स्थानीय ज्ञान को संरक्षित करता है, बल्कि उसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ व्यापक समाज तक पहुँचाने का भी महत्वपूर्ण कार्य करता है। आशा है कि भविष्य में ऐसे और भी प्रकाशन विभिन्न भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होंगे, ताकि अधिक से अधिक किसान, युवा और सामाजिक कार्यकर्ता इन अनुभवों से सीख लेकर टिकाऊ, पोषण-संवेदी एवं जलवायु-अनुकूल विकास की दिशा में आगे बढ़ सकें।

Shaping Community-led Climate Justice Pathways: Reflections from an Inspiring Learning Experience

Shaping Community-led Climate Justice Pathways: Reflections from an Inspiring Learning Experience
31 July 2026 |
Jacaranda Hall, India Habitat Centre, New Delhi
Climate change is no longer only an environmental concern—it is fundamentally a question of justice, equity, livelihoods, and sustainable development. Addressing these interconnected challenges requires solutions that are rooted in local realities and led by communities themselves.
It was a privilege to participate in the workshop "Shaping Community-led Climate Justice Pathways", organized by Vaagdhara at the India Habitat Centre, New Delhi. The workshop brought together policymakers, researchers, scientists, development practitioners, civil society organizations, and grassroots leaders to exchange ideas and explore pathways towards climate-resilient and community-led development.
The programme featured three thought-provoking technical sessions:
Understanding Pathways to Climate Justice and Development
Rooting Climate-Resilient Farming, Food Security and Local Economies in Agroecological Transformation
Advancing Climate and Energy Justice through Indigenous Pathways
The discussions emphasized that climate justice can only be achieved by empowering communities, strengthening local institutions, promoting agroecological farming systems, ensuring food and nutrition security, expanding access to clean energy, and recognizing the value of indigenous knowledge and traditional practices.
The workshop benefited from the insights of several distinguished experts, including Dr. A. K. Singh (ICAR), Dr. S. K. Bandyopadhyay (IARI), Mohammad Rohan (Director General, National Institute of Solar Energy - NISE), Narendranath Damodaran (National Collaboration of Natural Farming), Mr. Ramdas, R. P. Singh (Retd. IFS), Bhavani R. V. (CFNS), Sanjay Patil (BAIF), Dr. D. K. Singh (Former Principal Scientist, IARI), Tanmay Jain (Ram Astha Mission Foundation), Umesh Gupta (Former Chief Engineer, JVVNL), Aashiyana Mishra (MacArthur Foundation), Shelly Permettant (Mlinda Charitable Trust), and Manoj Kumar Jain (Renewable Energy Strategist & Former Project Director, NRED Haryana). Their diverse experiences highlighted the importance of collaboration across sectors to create effective and inclusive climate solutions.
Representing Anmol Foundation, I had the opportunity to participate in these enriching discussions and interact with experts and practitioners working at the forefront of climate resilience, sustainable agriculture, renewable energy, and community development. The workshop provided valuable insights that will strengthen our ongoing efforts to promote community-led climate action, sustainable livelihoods, natural resource management, and environmental stewardship.
My sincere appreciation goes to the entire Vaagdhara team, especially Jayesh Joshi, Sudip Sharma, Majid Khan, and all the organizing members, for curating such a meaningful platform for dialogue, learning, and collaboration.
As climate challenges continue to intensify, building resilient communities requires partnerships that combine scientific innovation, policy support, and indigenous wisdom. Workshops like this reaffirm that lasting climate solutions emerge when communities are placed at the center of decision-making and development processes.
I look forward to continued collaboration with organizations, institutions, and practitioners committed to advancing climate justice and creating a more sustainable and equitable future for all.
#ClimateJustice #CommunityLedDevelopment #ClimateResilience #Agroecology #NaturalFarming #RenewableEnergy #FoodSecurity #IndigenousKnowledge #Sustainability #ClimateAction #AnmolFoundation #Vaagdhara #IndiaHabitatCentre #SDG

Friday, 17 July 2026

प्रजातंत्र बनाम राजतंत्र: आखिर जनता किसका दरवाज़ा खटखटाए — संजय शर्मा

प्रजातंत्र बनाम राजतंत्र: आखिर जनता किसका दरवाज़ा खटखटाए?
— संजय शर्मा
राजतंत्र और प्रजातंत्र के बीच सबसे बड़ा अंतर यही माना जाता है कि राजतंत्र में सत्ता कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित होती है, जबकि प्रजातंत्र में अंतिम शक्ति जनता के पास होती है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या व्यवहार में हम वास्तव में प्रजातंत्र का अनुभव कर रहे हैं, या केवल उसके स्वरूप में जी रहे हैं?
आज समाज का एक बड़ा वर्ग ऐसा महसूस करता है कि उसकी भूमिका केवल कमाने, कर चुकाने और व्यवस्था को चलाने तक सीमित रह गई है। अधिकारों की बात तो होती है, लेकिन निर्णय प्रक्रिया में उसकी वास्तविक भागीदारी बहुत कम दिखाई देती है।
अक्सर "सामान्य वर्ग" के नाम पर बहुत चर्चा होती है। लेकिन यह भी एक विचारणीय प्रश्न है कि यह वर्ग वास्तव में किसका प्रतिनिधित्व करता है? यदि यह सभी के लिए खुला वर्ग है, तो फिर उन लोगों की पहचान और हितों का प्रतिनिधित्व कौन करेगा जो स्वयं को इसी वर्ग का हिस्सा मानते हैं? यह प्रश्न किसी के अधिकारों का विरोध नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व और समान अवसर की बहस है।
स्वतंत्रता के बाद भारत ने राजतंत्र को छोड़कर प्रजातंत्र को अपनाया। उद्देश्य स्पष्ट था—हर नागरिक को समान सम्मान मिले, उसकी आवाज़ सुनी जाए और अन्याय होने पर उसे न्याय पाने का अवसर मिले। इसी सोच के साथ संविधान बना, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना हुई और सत्ता के विभिन्न अंगों के बीच संतुलन की व्यवस्था बनाई गई।
जनप्रतिनिधियों के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून बनाया गया। प्रशासनिक व्यवस्था को जवाबदेह बनाने के लिए सेवा नियम और कानूनी प्रावधान बनाए गए। न्यायपालिका भी संवैधानिक मर्यादाओं और उत्तरदायित्वों के दायरे में कार्य करती है।
लेकिन एक लोकतांत्रिक प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है—यदि लोकतंत्र के सभी प्रमुख स्तंभ, अर्थात जनप्रतिनिधि, नौकरशाही और अन्य संवैधानिक संस्थाएँ, एक ही दिशा में खड़ी दिखाई दें और आम नागरिक स्वयं को असहाय महसूस करे, तो वह अपनी आवाज़ किस मंच पर उठाए? लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि नागरिकों को अपनी बात रखने और जवाबदेही मांगने का अवसर मिलता रहे। इसलिए संस्थाओं का स्वतंत्र और उत्तरदायी बने रहना लोकतंत्र की मूल आवश्यकता है।
आज के समय में प्रश्न बहुत हैं। संभव है कि आने वाली पीढ़ी—विशेषकर जेनरेशन Z और उसके बाद की पीढ़ियाँ—इन प्रश्नों के उत्तर अधिक मुखर होकर मांगें। वे अपनी भाषा, अपने माध्यम और अपने तरीकों से जवाबदेही की अपेक्षा करेंगी। तब इतिहास यह भी पूछेगा कि हमने उनके लिए कैसी व्यवस्था छोड़ी थी।
हमने अपनी आने वाली पीढ़ियों के सामने अनेक चुनौतियाँ छोड़ दी हैं—
धर्म के आधार पर विभाजन।
सामाजिक और प्रशासनिक वर्गों के आधार पर विभाजन।
जातिगत ऊँच-नीच की पुरानी विरासत, जिसका समाधान आज भी अधूरा है।
शिक्षा में असमानता—उच्च संस्थानों और सामान्य शैक्षणिक संस्थानों के बीच बढ़ती दूरी।
आर्थिक असमानता—बड़े उद्योगपतियों, व्यापारियों और सामान्य नागरिकों के बीच बढ़ती खाई।
प्रशासनिक पदों और आम कर्मचारियों के बीच बढ़ती सामाजिक दूरी।
पद, पैसा और शक्ति के आधार पर व्यक्ति का मूल्यांकन।
और अंततः ईमानदारी तथा बेईमानी के बीच धुंधली होती रेखाएँ।
इन प्रश्नों पर गंभीर संवाद होना चाहिए। लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं है; यह समान अवसर, जवाबदेही, न्याय और नागरिक सम्मान की सतत प्रक्रिया है। यदि समाज में संवाद समाप्त हो जाएगा, तो असंतोष बढ़ेगा। यदि संवाद जीवित रहेगा, तो समाधान भी निकलेंगे।
आज आवश्यकता किसी नए विभाजन की नहीं, बल्कि ऐसे लोकतंत्र को मजबूत करने की है जिसमें प्रत्येक नागरिक स्वयं को सम्मानित, सुरक्षित और सहभागी महसूस करे। यही लोकतंत्र की वास्तविक आत्मा है, और यही हमारी आने वाली पीढ़ियों के प्रति सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी।
— संजय शर्मा

Monday, 29 June 2026

सामाजिक बंधनों की मजबूती ही समाज की वास्तविक शक्ति है-संजय शर्मा

सामाजिक बंधनों की मजबूती ही समाज की वास्तविक शक्ति है— संजय शर्मा
आज जब हम आधुनिकता, शिक्षा, तकनीक और आर्थिक प्रगति के नए-नए आयाम छू रहे हैं, तब एक प्रश्न बार-बार मन में उठता है—क्या हमने इस विकास की कीमत अपने सामाजिक रिश्तों और सामुदायिक एकता के रूप में चुकाई है?
एक समय था जब हमारे सामाजिक संगठन अत्यंत मजबूत हुआ करते थे। समाज केवल लोगों का समूह नहीं था, बल्कि वह एक जीवंत व्यवस्था थी, जिसके अपने नियम, परंपराएँ और अनुशासन थे। पूर्वजों ने समाज को संगठित और सुरक्षित रखने के लिए ऐसे नियम बनाए थे, जिनका पालन सभी के लिए अनिवार्य था। जो व्यक्ति इन नियमों का उल्लंघन करता था, उसे सामाजिक दंड का सामना करना पड़ता था।
इन नियमों का उद्देश्य किसी को दबाना नहीं, बल्कि समाज में अनुशासन, पारस्परिक सम्मान और सामूहिक उत्तरदायित्व बनाए रखना था। समाज का यह अनुशासन लोगों को गलत कार्य करने से रोकता था और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का भाव पैदा करता था। परिणामस्वरूप समाज के भीतर एकता इतनी मजबूत होती थी कि बाहरी लोग भी उस समाज की ओर गलत दृष्टि डालने से पहले कई बार सोचते थे।
समय के साथ परिस्थितियाँ बदलीं। शिक्षा का विस्तार हुआ, रोजगार के नए अवसर आए, लोग गाँवों से शहरों और फिर दूसरे राज्यों व देशों तक पहुँच गए। यह परिवर्तन आवश्यक भी था और विकास का प्रतीक भी। लेकिन इस परिवर्तन के साथ-साथ सामाजिक बंधन कमजोर होते चले गए। लोग व्यक्तिगत उपलब्धियों को प्राथमिकता देने लगे और सामुदायिक जीवन पीछे छूटता गया।
आज अनेक स्थानों पर सामाजिक संगठन मौजूद तो हैं, लेकिन उनका प्रभाव पहले जैसा नहीं दिखाई देता। कई बार समाज का व्यक्ति ही समाज के दूसरे व्यक्ति का सम्मान नहीं करता। पारस्परिक सहयोग, सामूहिक निर्णय और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना पहले की तुलना में कमजोर होती जा रही है। इसका परिणाम केवल सामाजिक विघटन नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक अकेलेपन के रूप में भी सामने आ रहा है।
यह भी एक विडंबना है कि पहले संसाधन सीमित थे, लेकिन रिश्ते समृद्ध थे। आर्थिक साधन कम थे, परंतु अपनापन, सम्मान, विश्वास और सहयोग भरपूर था। आज संसाधनों की कोई कमी नहीं है। पक्के मकान हैं, आधुनिक सुविधाएँ हैं, बेहतर शिक्षा और रोजगार हैं, लेकिन सामाजिक निकटता कम होती जा रही है।
आज पक्के घरों की दीवारें मजबूत हैं, पर रिश्तों के दरवाजे पहले की तरह खुले नहीं हैं। ज्ञान बढ़ा है, लेकिन समाज के वरिष्ठजनों का स्नेह, अनुभव और आशीर्वाद धीरे-धीरे जीवन से दूर होता जा रहा है। आर्थिक समृद्धि आई है, लेकिन गाँवों की मिट्टी की खुशबू, पेड़ों के रसीले फल, खेतों की ताजी सब्जियाँ और चौपाल की आत्मीयता कहीं पीछे छूट गई है। हम अधिक स्मार्ट और आधुनिक अवश्य हुए हैं, लेकिन शायद अपनों से कुछ अधिक दूर भी हो गए हैं।
जो लोग अपने गाँव, समाज और शहर से दूर अन्य राज्यों या देशों में बस गए हैं, उनका अपने मूल समाज से जुड़ाव भी धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। यह दूरी केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक भी बनती जा रही है।
निश्चित रूप से समय को पीछे नहीं लौटाया जा सकता। आधुनिक जीवन और विकास को भी नकारा नहीं जा सकता। लेकिन इतना अवश्य किया जा सकता है कि हम अपनी सामाजिक परंपराओं, सामूहिक उत्तरदायित्व और सामाजिक संगठनों को फिर से मजबूत बनाने का प्रयास करें।
यह आवश्यक नहीं कि पुराने समय की कठोर व्यवस्थाएँ उसी रूप में वापस लाई जाएँ, लेकिन उनके मूल उद्देश्य—अनुशासन, सामाजिक उत्तरदायित्व, पारस्परिक सम्मान, सहयोग और सामुदायिक एकता—को वर्तमान समय के अनुरूप पुनर्जीवित किया जा सकता है।
यदि परिवार, समाज और युवा पीढ़ी मिलकर सामाजिक संवाद बढ़ाएँ, नियमित सामुदायिक बैठकें करें, पारंपरिक आयोजनों में सक्रिय भागीदारी निभाएँ और समाज के प्रति अपने दायित्व को समझें, तो सामाजिक संगठन फिर से प्रभावशाली बन सकते हैं।
आख़िरकार, किसी भी समाज की वास्तविक शक्ति केवल उसकी आर्थिक समृद्धि या आधुनिक संसाधनों में नहीं होती, बल्कि उसके लोगों के बीच मौजूद विश्वास, अपनत्व, अनुशासन और एकता में होती है।
शायद हमारे दिलों में आज भी कहीं न कहीं यह कसक बनी हुई है कि "काश, वे पुराने दिन लौट आते।" वे दिन पूरी तरह लौटें या न लौटें, लेकिन यदि हम सामाजिक बंधनों को फिर से मजबूत बनाने का संकल्प लें, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अधिक संगठित, संवेदनशील और सशक्त समाज अवश्य बना सकते हैं।
— संजय शर्मा

Saturday, 6 June 2026

अभिव्यक्ति की आजादी, जन असंतोष और उभरते ऑनलाइन आंदोलन: काक्रोच जनता पार्टी पर एक विमर्श

अभिव्यक्ति की आजादी, जन असंतोष और उभरते ऑनलाइन आंदोलन: काक्रोच जनता पार्टी पर एक विमर्श
बचपन से हम सुनते और पढ़ते आए हैं कि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। यह लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक मानी जाती है। सिद्धांत रूप में हर व्यक्ति को अपने विचार रखने, सरकार की नीतियों की आलोचना करने तथा सार्वजनिक मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार है।
लेकिन व्यवहारिक स्तर पर स्थिति अक्सर अलग दिखाई देती है। जब कोई व्यक्ति अपनी बात रखता है, विशेषकर जब वह सत्ता या सरकार की नीतियों के विरुद्ध होती है, तो उसके समर्थन और विरोध में लोग तुरंत खड़े हो जाते हैं। लोकतंत्र में यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि विचारों का टकराव ही लोकतांत्रिक विमर्श का आधार है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब बहस तथ्यों और तर्कों से हटकर आरोप-प्रत्यारोप, व्यक्तिगत आक्षेप और राजनीतिक खेमेबंदी में बदल जाती है।
हाल के समय में सोशल मीडिया पर एक नया घटनाक्रम देखने को मिला। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के एक बयान के संदर्भ में ऑनलाइन जगत में "काक्रोच जनता पार्टी" नाम से एक समूह या अभियान चर्चा में आया। देखते ही देखते इस नाम ने सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा पैदा कर दी। इसके समर्थकों और आलोचकों दोनों की संख्या बढ़ने लगी और अनेक लोग इसके पीछे छिपे जनभावनाओं को समझने का प्रयास करने लगे।
इस चर्चा के दौरान कई ऐसे मुद्दे सामने आए जिन्हें कुछ लोग जनता के भीतर बढ़ते असंतोष के कारणों के रूप में देखते हैं। इनमें युवाओं के भीतर भविष्य और रोजगार को लेकर चिंता, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं पर नाराज़गी, बढ़ती महंगाई, ईंधन की कीमतें, आर्थिक चुनौतियाँ, राजनीतिक दलों की बयानबाजी तथा आम जनता की समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता जैसे विषय शामिल रहे।
इसके अतिरिक्त, देश की राजनीति, चुनावी प्रक्रियाओं, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और शासन व्यवस्था से जुड़े अनेक प्रश्न भी चर्चा का हिस्सा बने। सोशल मीडिया पर विभिन्न विचारधाराओं के लोग अपनी-अपनी व्याख्याएँ प्रस्तुत करने लगे। कुछ लोगों ने इसे जनता के असंतोष की अभिव्यक्ति बताया, जबकि कुछ ने इसे अस्थायी डिजिटल ट्रेंड माना।
स्थिति तब और रोचक हो गई जब 6 जून को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन या धरने की चर्चा होने लगी। इसके बाद राजनीतिक हलकों, मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर बहस का दायरा और बढ़ गया। विभिन्न राजनीतिक दलों के समर्थकों तथा विरोधियों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से इस पूरे घटनाक्रम को देखने और समझाने का प्रयास किया।
लोकतांत्रिक राजनीति की एक वास्तविकता यह भी है कि कोई भी नया राजनीतिक या सामाजिक प्रभाव उभरता है तो उसके समर्थन के साथ-साथ उसके विरोध की भी शुरुआत हो जाती है। ऐसे में किसी भी नए आंदोलन, संगठन या विचारधारा को लेकर तरह-तरह के आरोप लगाए जाना असामान्य नहीं है। किसी ने इसे किसी राजनीतिक दल से जोड़ने का प्रयास किया, किसी ने इसे विदेशी प्रभाव से प्रेरित बताया, तो किसी ने इसे कुछ दिनों का सोशल मीडिया ट्रेंड कहकर खारिज करने की कोशिश की। वहीं कुछ लोगों ने इसके पक्ष में भी अपनी आवाज़ उठाई।
दिलचस्प बात यह रही कि आंदोलन या अभियान के वास्तविक मुद्दों से अधिक चर्चा उसके इर्द-गिर्द पैदा किए गए राजनीतिक नैरेटिव की होने लगी। मीडिया अपने दृष्टिकोण से घटनाओं को प्रस्तुत करने लगी, राजनीतिक दल अपने-अपने राजनीतिक हितों के अनुसार व्याख्याएँ करने लगे और सोशल मीडिया पर आरोपों तथा प्रत्यारोपों का सिलसिला चल पड़ा।
यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी खड़ा करती है—क्या हम किसी विचार, आंदोलन या असहमति को उसके मूल मुद्दों के आधार पर समझने का प्रयास करते हैं, या पहले उसे किसी राजनीतिक खांचे में फिट करने की कोशिश करते हैं?
लोकतंत्र में असहमति कोई खतरा नहीं होती; बल्कि वह लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण होती है। यदि जनता के किसी वर्ग के भीतर वास्तव में असंतोष है, तो उसे सुनना और समझना लोकतांत्रिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है। दूसरी ओर, किसी भी आंदोलन या विचार का मूल्यांकन तथ्यों, पारदर्शिता और उसके वास्तविक उद्देश्यों के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक आरोपों और पूर्वाग्रहों के आधार पर।
काक्रोच जनता पार्टी का यह प्रकरण चाहे एक अल्पकालिक सोशल मीडिया घटना साबित हो या किसी बड़े जनमत का संकेत, उसने एक बार फिर यह अवश्य दिखाया है कि डिजिटल युग में जनता की भावनाएँ, असंतोष और अपेक्षाएँ पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज़ी से सामने आती हैं। अब चुनौती केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की नहीं, बल्कि उस अभिव्यक्ति को समझने, सुनने और लोकतांत्रिक संवाद में बदलने की भी है।
लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि सत्ता, विपक्ष, मीडिया और नागरिक—सभी एक-दूसरे की बात सुनने का धैर्य रखें। क्योंकि किसी भी समाज की वास्तविक शक्ति केवल सहमति में नहीं, बल्कि असहमति को सम्मान देने की क्षमता में निहित होती है।

पर्यावरण संरक्षण का वास्तविक मार्ग: केवल वृक्षारोपण नहीं, पारंपरिक वृक्षों का संरक्षण भी आवश्यक

पर्यावरण संरक्षण का वास्तविक मार्ग: केवल वृक्षारोपण नहीं, पारंपरिक वृक्षों का संरक्षण भी आवश्यक
हाल ही में विश्व पर्यावरण दिवस बीता। देश-दुनिया में लोगों ने उत्साहपूर्वक इस दिवस को मनाया, पौधे लगाए, जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया। यह एक सकारात्मक संकेत है कि अब लोग पर्यावरण के महत्व को समझने लगे हैं। जलवायु परिवर्तन, बढ़ती गर्मी, अनियमित वर्षा और प्राकृतिक आपदाओं के रूप में प्रकृति हमें लगातार यह संदेश दे रही है कि यदि हम उसके संतुलन से खिलवाड़ करेंगे तो उसका परिणाम भी हमें भुगतना पड़ेगा।
प्रकृति का अपना एक संतुलन और व्यवस्था है। जब मनुष्य इस व्यवस्था को अनदेखा करता है, तो प्रकृति भी अपने तरीके से प्रतिक्रिया देती है। आज बढ़ती गर्मी और पर्यावरणीय संकट उसी का परिणाम हैं।
क्या केवल पौधे लगाना पर्याप्त है?
आजकल वृक्षारोपण के नाम पर अधिकतर लोग ऐसे पौधों को प्राथमिकता देते हैं जो आकार में छोटे हों, जल्दी बढ़ें, अधिक फल दें या दिखने में आकर्षक हों। कई बार दूसरे प्रदेशों या देशों से लाए गए पौधों का भी रोपण किया जाता है। निस्संदेह ये पौधे मानव दृष्टि से उपयोगी और आकर्षक हो सकते हैं, लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या ये पौधे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी उतने ही उपयोगी हैं?
मेरे व्यक्तिगत अनुभव बताते हैं कि पशु-पक्षी ऐसे पौधों को उतनी प्राथमिकता नहीं देते जितनी पारंपरिक और स्थानीय वृक्षों को देते हैं। पक्षी न केवल उनमें कम बैठते हैं बल्कि कई बार उनमें घोंसला भी नहीं बनाते। इसी प्रकार पशु भी बड़े, घने और छायादार वृक्षों के नीचे ही आश्रय लेना पसंद करते हैं।
पशु-पक्षियों की दृष्टि से पारंपरिक वृक्षों का महत्व
पशु-पक्षियों का व्यवहार हमें बहुत कुछ सिखाता है। वे किसी वृक्ष का चयन केवल संयोगवश नहीं करते, बल्कि उनकी अपनी प्राकृतिक आवश्यकताएँ होती हैं।
1. सुरक्षा की दृष्टि से उपयुक्त
बड़े और घनी शाखाओं वाले वृक्ष पक्षियों को शिकारी जीवों और प्रतिकूल मौसम से सुरक्षा प्रदान करते हैं। छोटे पौधों में यह सुरक्षा नहीं मिल पाती।
2. मजबूत संरचना
पारंपरिक वृक्षों के तने और शाखाएँ अधिक मजबूत होती हैं, जिससे पक्षियों के घोंसले सुरक्षित रहते हैं। छोटे या कमजोर पौधे तेज हवा और बारिश में पर्याप्त सहारा नहीं दे पाते।
3. बेहतर छाया और ताप नियंत्रण
बड़े वृक्षों की छाया आसपास के वातावरण को ठंडा बनाए रखती है। यही कारण है कि पशु प्रायः नीम, पीपल, बरगद, आम और अन्य बड़े वृक्षों के नीचे विश्राम करना पसंद करते हैं।
4. स्थानीय पर्यावरण से सामंजस्य
स्थानीय या पारंपरिक वृक्ष सदियों से उस क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी और जीव-जंतुओं के साथ विकसित हुए हैं। इसलिए स्थानीय पक्षी, कीट और अन्य जीव उनके साथ बेहतर तालमेल रखते हैं। बाहरी प्रजातियों के पौधों में यह सामंजस्य अक्सर नहीं बन पाता।
5. जैव विविधता का संरक्षण
यह भी देखा गया है कि कुछ पारंपरिक वृक्षों पर विभिन्न प्रकार के कीट, पक्षी और जीव अपना आश्रय बनाते हैं, जबकि कई संकर (हाइब्रिड) पौधों पर यह गतिविधियाँ बहुत कम दिखाई देती हैं। उदाहरण के रूप में ग्रामीण क्षेत्रों में यह अनुभव किया गया है कि कलमी आम के कुछ पौधों पर लाल चींटियाँ भी सामान्य रूप से अपना घर नहीं बनातीं।
पौधों की भी होती है अपनी प्राकृतिक अनुकूलता
वनस्पति विज्ञान के जानकार बताते हैं कि प्रत्येक पौधे की अपनी पारिस्थितिक आवश्यकताएँ होती हैं। पहाड़ी क्षेत्रों के पौधे पहाड़ों की जलवायु में बेहतर विकसित होते हैं, जबकि मैदानी क्षेत्रों के पौधे मैदानों में। इसी प्रकार तराई क्षेत्र के पौधे अपनी विशिष्ट परिस्थितियों में अधिक स्वस्थ रहते हैं।
प्रकृति ने प्रत्येक क्षेत्र के लिए एक विशेष वनस्पति संरचना विकसित की है। जब हम उस प्राकृतिक व्यवस्था को समझे बिना केवल आकर्षण या व्यावसायिक लाभ के आधार पर पौधों का चयन करते हैं, तो उसका प्रभाव स्थानीय जैव विविधता पर पड़ता है।
पारंपरिक वृक्ष और ग्रामीण जीवन
हमारी पारंपरिक जीवनशैली में वृक्ष केवल छाया या फल देने वाले साधन नहीं थे, बल्कि वे जीवन का अभिन्न हिस्सा थे।
नीम, पीपल, बरगद, बेल, सहजन, जामुन और अर्जुन जैसे वृक्ष औषधीय गुणों से भरपूर थे।
अनेक वृक्ष पशुओं के चारे का स्रोत थे।
कई पौधे ग्रामीण हस्तशिल्प और घरेलू उपयोग की वस्तुओं के निर्माण में काम आते थे।
पक्षियों, मधुमक्खियों और अन्य जीवों के लिए वे प्राकृतिक आवास प्रदान करते थे।
दुर्भाग्यवश आधुनिकता और व्यावसायिक वृक्षारोपण के कारण ऐसे वृक्षों की संख्या लगातार घटती जा रही है।
पर्यावरण संरक्षण का व्यापक दृष्टिकोण
यदि हम वास्तव में पर्यावरण को बचाना चाहते हैं, तो केवल पौधे लगाने की संख्या बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। हमें यह भी देखना होगा कि हम कौन से पौधे लगा रहे हैं। स्थानीय, पारंपरिक और जैव विविधता को सहारा देने वाले वृक्षों को प्राथमिकता देना समय की आवश्यकता है।
पर्यावरण संरक्षण का अर्थ केवल हरियाली बढ़ाना नहीं है, बल्कि ऐसा पारिस्थितिक तंत्र विकसित करना है जिसमें मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट और वनस्पतियाँ सभी संतुलित रूप से जीवन जी सकें।
निष्कर्ष
विश्व पर्यावरण दिवस हमें केवल एक दिन पौधे लगाने की प्रेरणा नहीं देता, बल्कि प्रकृति के साथ अपने संबंधों पर पुनर्विचार करने का अवसर भी प्रदान करता है। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ स्वच्छ वातावरण, जैव विविधता और प्राकृतिक संतुलन का लाभ उठा सकें, तो हमें पारंपरिक और स्थानीय वृक्षों के संरक्षण तथा संवर्धन पर विशेष ध्यान देना होगा।
पशु-पक्षियों की बदलती आदतें भी हमें यही संकेत दे रही हैं कि प्रकृति के मूल स्वरूप को बनाए रखना आवश्यक है। इसलिए समय की मांग है कि हम केवल वृक्षारोपण न करें, बल्कि ऐसे वृक्ष लगाएँ जो प्रकृति, पर्यावरण और समस्त जीव-जगत के लिए वास्तव में उपयोगी हों।
— संजय शर्मा

Thursday, 4 June 2026

विश्व पर्यावरण दिवस: एक दिन का उत्सव या जीवनभर का संकल्प?

विश्व पर्यावरण दिवस: एक दिन का उत्सव या जीवनभर का संकल्प?
5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस है। सभी को इस महत्वपूर्ण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
विश्व पर्यावरण दिवस की शुरुआत वर्ष 1972 में हुई थी, जब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पर्यावरण संरक्षण के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से इसे स्थापित किया। तब से हर वर्ष 5 जून को दुनिया भर के देशों में यह दिवस मनाया जाता है। कहीं वृक्षारोपण होता है, कहीं जागरूकता रैलियाँ निकलती हैं, कहीं कार्यशालाएँ आयोजित होती हैं और कहीं बड़े-बड़े सम्मेलनों में पर्यावरण संरक्षण पर चर्चा होती है।
लेकिन एक प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है—क्या केवल एक दिन पर्यावरण दिवस मना लेने से पर्यावरण सुरक्षित हो जाएगा?
एक गांव की कहानी
एक गांव के बाहर कभी घना जंगल हुआ करता था। जंगल के बीच से एक छोटी नदी बहती थी। पक्षियों का कलरव, पेड़ों की छांव और स्वच्छ हवा वहां की पहचान थी। गांव के बुजुर्ग बताते थे कि गर्मियों में भी नदी का पानी कभी नहीं सूखता था और खेतों में भरपूर उत्पादन होता था।
समय बदला। विकास के नाम पर सड़कें बनीं, खदानें खुलीं, उद्योग स्थापित हुए और धीरे-धीरे जंगल कटने लगे। कुछ वर्षों में जंगल की जगह कंक्रीट की इमारतों ने ले ली। नदी सिकुड़ती गई और भूजल स्तर नीचे चला गया।
हर वर्ष 5 जून को गांव में भी पर्यावरण दिवस मनाया जाता था। मंच सजता था, भाषण होते थे, कुछ पौधे लगाए जाते थे और फिर सब अपने-अपने घर चले जाते थे।
एक दिन गांव के एक बुजुर्ग ने सभा में खड़े होकर पूछा—
"हम हर साल पौधे लगाते हैं, लेकिन क्या कभी यह भी देखा कि पिछले साल लगाए गए पौधों में कितने जीवित हैं? हम पर्यावरण बचाने की बातें करते हैं, लेकिन क्या अपने व्यवहार में कोई बदलाव लाते हैं?"
सभा में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया।
बुजुर्ग ने आगे कहा—
"पर्यावरण केवल पेड़ लगाने से नहीं बचेगा। पर्यावरण तब बचेगा जब हम पेड़ों को बड़ा होने तक संभालेंगे। जब हम नदियों को प्रदूषित होने से बचाएंगे। जब हम जरूरत से ज्यादा उपभोग करना छोड़ेंगे। जब हम पानी, बिजली और संसाधनों का संयमित उपयोग करेंगे।"
उनकी बात लोगों के दिल को छू गई।
बदलाव की शुरुआत
उस वर्ष गांव ने एक नया संकल्प लिया।
उन्होंने तय किया कि केवल पौधे नहीं लगाएंगे, बल्कि उनकी जिम्मेदारी भी लेंगे। हर परिवार को कुछ पौधों की देखभाल का दायित्व दिया गया। वर्षा जल संचयन शुरू किया गया। गांव के तालाब और नदी की सफाई की गई। प्लास्टिक का उपयोग कम किया गया।
लोगों ने यह भी समझा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। सरकार नीतियां बना सकती है, लेकिन धरती को बचाने का काम समाज और नागरिकों की भागीदारी से ही संभव है।
धीरे-धीरे गांव में हरियाली लौटने लगी। पक्षी वापस आने लगे। भूजल स्तर सुधरने लगा और लोगों के मन में भी प्रकृति के प्रति अपनापन बढ़ने लगा।
आज की आवश्यकता
आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, अनियमित मानसून, जल संकट और प्रदूषण जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे समय में हमें केवल पर्यावरण दिवस मनाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
हमें यह समझना होगा कि—
पेड़ लगाने के साथ-साथ उन्हें बचाना भी जरूरी है।
नदियों, तालाबों और जलस्रोतों का संरक्षण करना होगा।
पानी की बर्बादी रोकनी होगी।
प्रदूषण और अनावश्यक धुएं को कम करना होगा।
जरूरत से ज्यादा उपभोग की आदत छोड़नी होगी।
पुनः उपयोग (Reuse) और पुनर्चक्रण (Recycle) को अपनाना होगा।
स्थानीय संसाधनों और प्रकृति आधारित जीवनशैली को बढ़ावा देना होगा।
निष्कर्ष
विश्व पर्यावरण दिवस केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह हमें याद दिलाने का अवसर है कि प्रकृति के बिना मानव सभ्यता का अस्तित्व संभव नहीं है।
यदि हम सचमुच आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा, निर्मल जल और हरियाली से भरी धरती देना चाहते हैं, तो पर्यावरण संरक्षण को एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनआंदोलन बनाना होगा।
आइए इस 5 जून को केवल पौधा लगाने का नहीं, बल्कि प्रकृति को बचाने का संकल्प लें।
"पर्यावरण दिवस मनाना अच्छी बात है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है पर्यावरण को अपने जीवन का हिस्सा बनाना। पेड़ केवल लगाएं नहीं, उन्हें बचाएं भी; पानी केवल उपयोग न करें, उसे संजोएं भी; और प्रकृति से केवल लें नहीं, उसे लौटाएं भी।"
— संजय शर्मा
विश्व पर्यावरण दिवस, 5 जून 🌿🌍

Saturday, 30 May 2026

अच्छे दिनों की तलाश में — गांव से शहर और फिर दूर होती पीढ़ियाँ

अच्छे दिनों की तलाश में — गांव से शहर और फिर दूर होती पीढ़ियाँ
भारत का सामाजिक और आर्थिक ढांचा सदियों तक गांवों और संयुक्त परिवारों पर आधारित रहा है। खेती, पशुपालन, पारिवारिक व्यवसाय और सामूहिक जीवन व्यवस्था ने समाज को स्थायित्व प्रदान किया। परिवार के सदस्य साथ रहते थे, साथ काम करते थे और एक-दूसरे के सुख-दुख के सहभागी होते थे।
लेकिन पिछले कुछ दशकों में परिस्थितियाँ तेजी से बदली हैं। गांवों में रोजगार के सीमित अवसर, खेती की बढ़ती लागत, आधुनिक शिक्षा के बाद बदलती आकांक्षाएँ तथा सामाजिक दबावों ने युवाओं को गांवों से शहरों की ओर पलायन करने के लिए प्रेरित किया। जो कहानी कभी केवल गांवों की थी, वह आज शहरों और महानगरों की भी कहानी बन चुकी है।
इस विषय पर विचार करने का उद्देश्य किसी के रोजगार, शिक्षा या प्रगति का विरोध करना नहीं है, बल्कि उस सामाजिक परिवर्तन को समझना है जिसके परिणामस्वरूप परिवार बिखर रहे हैं, बुजुर्ग अकेले हो रहे हैं और समाज धीरे-धीरे अपनी सामूहिकता खोता जा रहा है।
यह आवश्यक है कि हम विकास और पारिवारिक जीवन के बीच संतुलन स्थापित करने के उपाय खोजें।
समस्या : गांव से शहर तक का पलायन
गांवों में रोजगार की कमी और खेती की घटती लाभप्रदता ने युवाओं को रोजगार की तलाश में बाहर जाने के लिए मजबूर किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद अधिकांश युवा खेती या पारंपरिक कार्यों को अपनाने के बजाय नौकरी को अधिक सुरक्षित और प्रतिष्ठित विकल्प मानते हैं।
इसके साथ कुछ सामाजिक कारण भी इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैं।
1. दहेज प्रथा का दबाव
जिस परिवार में बेटी होती है, वहाँ माता-पिता का एक बड़ा हिस्सा भविष्य के विवाह और दहेज की व्यवस्था में लग जाता है। आर्थिक सुरक्षा की तलाश उन्हें अधिक आय के स्रोत खोजने के लिए प्रेरित करती है।
2. नौकरी को प्रतिष्ठा का मानदंड मानना
आज भी अनेक परिवार अपनी बेटियों का विवाह ऐसे युवक से करना अधिक पसंद करते हैं जो सरकारी या निजी नौकरी करता हो। स्वयं का व्यवसाय, खेती या स्थानीय रोजगार अक्सर कम महत्व का समझा जाता है।
परिणामस्वरूप माता-पिता भी अपने बच्चों को बाहर नौकरी करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। उनके मन में एक आशा होती है कि बेटा या बेटी अच्छी नौकरी पाएंगे, अधिक कमाएंगे और परिवार की आर्थिक समस्याओं का समाधान कर देंगे।
अच्छे दिनों की उम्मीद
युवा गांव छोड़कर शहर जाता है। वह अपनी क्षमता के अनुसार नौकरी करता है, सीमित साधनों में जीवन बिताता है और अपनी आय का एक हिस्सा घर भेजता है।
शुरुआती वर्षों में परिवार को लगता है कि उनकी मेहनत सफल हो रही है। घर में आर्थिक सहायता आने लगती है और यह विश्वास मजबूत होता है कि अब "अच्छे दिन" आने वाले हैं।
लेकिन जीवन की वास्तविकताएँ अक्सर कल्पनाओं से भिन्न होती हैं।
धीरे-धीरे बढ़ती दूरी
समय के साथ युवा का जीवन शहर से जुड़ने लगता है। नौकरी, मित्र मंडली, बच्चों की शिक्षा, घर की किश्तें और नई जिम्मेदारियाँ उसे उसी स्थान पर स्थायी बना देती हैं।
वह गांव आता तो है, लेकिन पहले त्योहारों पर, फिर विशेष कार्यक्रमों पर और धीरे-धीरे उसका आना-जाना भी कम हो जाता है।
एक समय ऐसा आता है जब गांव केवल उसकी स्मृतियों का हिस्सा बनकर रह जाता है।
यही स्थिति अब शहरों में भी दिखाई देने लगी है। आज महानगरों के बच्चे रोजगार और बेहतर अवसरों के लिए दूसरे शहरों अथवा विदेशों में जा रहे हैं और वहीं स्थायी रूप से बस रहे हैं।
बुजुर्गों की बढ़ती अकेलेपन की समस्या
जब बच्चे दूर बस जाते हैं तो माता-पिता कुछ समय तक उनकी सफलता का गर्वपूर्वक वर्णन करते हैं—
"मेरा बेटा फलाँ शहर में है।"
"मेरी बेटी विदेश में रहती है।"
"उन्होंने बड़ा घर खरीद लिया है।"
"अच्छी नौकरी कर रहे हैं।"
लेकिन समय बीतने के साथ यह गर्व अक्सर एक गहरे अकेलेपन में बदल जाता है।
बढ़ती उम्र में माता-पिता को सहारे की आवश्यकता होती है। अनेक बुजुर्ग गांवों और शहरों दोनों में पड़ोसियों के भरोसे जीवन बिताने को मजबूर हो जाते हैं। कुछ लोग वृद्धाश्रमों का सहारा लेते हैं क्योंकि वे अकेले जीवन की चुनौतियों का सामना नहीं कर पाते।
विडंबना यह है कि जिन "अच्छे दिनों" की उम्मीद में परिवार ने अपने बच्चों को दूर भेजा था, वे अच्छे दिन आर्थिक रूप से तो कुछ हद तक आए, लेकिन भावनात्मक और पारिवारिक स्तर पर कई बार दूर होते चले गए।
सामाजिक प्रभाव
इस प्रवृत्ति के कई व्यापक परिणाम सामने आ रहे हैं—
संयुक्त परिवारों का विघटन।
गांवों में श्रम और युवा शक्ति की कमी।
पारंपरिक ज्ञान और कौशल का लुप्त होना।
बुजुर्गों का अकेलापन और असुरक्षा।
बच्चों का अपने मूल गांव और संस्कृति से कटाव।
सामाजिक संबंधों और सामुदायिक सहयोग में कमी।
समाधान : संतुलित विकास की दिशा में
समस्या का समाधान केवल भावनात्मक अपील से नहीं, बल्कि व्यावहारिक और सामाजिक सुधारों से संभव है।
1. स्थानीय एवं स्थायी रोजगार का निर्माण
गांवों और छोटे शहरों में कृषि आधारित उद्योग, लघु उद्योग, स्वरोजगार और स्थानीय उद्यम विकसित किए जाएँ ताकि युवाओं को अपने क्षेत्र में ही सम्मानजनक रोजगार मिल सके।
2. पारिवारिक व्यवसायों को बढ़ावा
ऐसी व्यवस्था विकसित हो जिसमें माता-पिता अपने व्यवसाय, खेती या उद्यम में बच्चों को सहभागी बना सकें। इससे रोजगार और परिवार दोनों सुरक्षित रहेंगे।
3. दहेज प्रथा का सामाजिक बहिष्कार
दहेज की मानसिकता को समाप्त करना आवश्यक है। जब विवाह आर्थिक लेन-देन के बजाय मानवीय मूल्यों पर आधारित होंगे, तब परिवारों पर अनावश्यक आर्थिक दबाव कम होगा।
4. विवाह के दृष्टिकोण में परिवर्तन
समाज को केवल नौकरी करने वाले युवकों को प्राथमिकता देने की सोच से आगे बढ़ना होगा। ईमानदार, स्वावलंबी और स्वयं का व्यवसाय या रोजगार करने वाले युवाओं को भी समान सम्मान मिलना चाहिए।
5. संयुक्त परिवार और पारिवारिक मूल्यों का पुनर्जीवन
परिवारों में संवाद, सहयोग और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना को पुनः मजबूत करना होगा। आधुनिक जीवन के साथ भी पारिवारिक जुड़ाव बनाए रखना संभव है।
6. गांवों को अवसरों का केंद्र बनाना
यदि शिक्षा, स्वास्थ्य, इंटरनेट, उद्योग और आधुनिक सुविधाएँ गांवों तक पहुँचेंगी तो पलायन की मजबूरी स्वतः कम होगी।
निष्कर्ष
रोजगार, शिक्षा और प्रगति जीवन की आवश्यकताएँ हैं, लेकिन यदि इनकी कीमत परिवारों के विघटन, बुजुर्गों के अकेलेपन और सामाजिक संबंधों के टूटने के रूप में चुकानी पड़े, तो हमें अपने विकास मॉडल पर पुनर्विचार करना होगा।
समाधान गांव और शहर के बीच किसी एक को चुनने में नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने में है जहाँ व्यक्ति प्रगति भी कर सके और अपने परिवार तथा समाज से जुड़ा भी रह सके।
शायद अब समय आ गया है कि हम केवल "अच्छे दिनों की तलाश" न करें, बल्कि ऐसे स्थायी और संतुलित जीवन की तलाश करें जिसमें रोजगार, परिवार और सामाजिक संबंध तीनों साथ-साथ विकसित हों।

Thursday, 28 May 2026

बदलते गांव की कहानी — यादों से आधुनिकता तक

बदलते गांव की कहानी — यादों से आधुनिकता तक
हमारे समाज के सम्मानित राजेश कुमार राय जी ने गांव के जीवन में आए परिवर्तन को बड़े सरल लेकिन गहरे शब्दों में व्यक्त किया है। यह केवल एक व्यक्ति की स्मृति नहीं, बल्कि पूरे ग्रामीण भारत की बदलती तस्वीर है।
एक समय था जब गांवों का जीवन पूरी तरह प्रकृति के साथ जुड़ा हुआ था। आवागमन और संचार के साधन बहुत सीमित थे। लोगों की दुनिया गांव, खेत, नदी, बगीचे और आसपास के कस्बों तक ही सिमटी रहती थी। यात्रा का मुख्य साधन पैदल चलना था। बाद में साइकिल आई, जिसने लोगों के जीवन को कुछ आसान बनाया।
उस दौर में बीस-पच्चीस किलोमीटर की दूरी तय करना भी कठिन माना जाता था, विशेषकर गर्मी और बरसात के दिनों में। लेकिन ग्रामीण जीवन का संघर्ष और श्रम इतना मजबूत था कि लोग कांवड़, बहंगी और बोझ लेकर पैंतीस-चालीस किलोमीटर तक पैदल चल जाते थे। शरीर थकता था, पर मन में धैर्य और जीवन में संतोष था।
समय बदला और उसके साथ गांवों की तस्वीर भी बदलती चली गई।
आज वही दूरी, जिसे तय करने में पूरा दिन लग जाता था, अब मोटरसाइकिल और अन्य वाहनों से दो घंटे में पूरी हो जाती है। साइकिल की जगह मोटरसाइकिल ने ले ली है। जहां कभी चिट्ठियों का इंतजार होता था, वहीं आज एक बटन दबाते ही देश-विदेश में वीडियो कॉल पर बातचीत हो जाती है।
तकनीक ने जीवन को तेज, सुविधाजनक और आधुनिक बना दिया है। गांव अब धीरे-धीरे हाईटेक होते जा रहे हैं। मोबाइल, इंटरनेट, सड़क, बिजली और आधुनिक साधनों ने ग्रामीण जीवन की दिशा बदल दी है।
लेकिन इस बदलाव के साथ कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं।
आज आवश्यकताएं सीमाओं से बाहर निकल चुकी हैं, जबकि रोजगार के अवसर सीमित हैं। पहले गांव आत्मनिर्भर थे। नमक और तंबाकू जैसी कुछ चीजों को छोड़ दें तो रोजमर्रा के खान-पान की लगभग हर वस्तु गांव में ही पैदा हो जाती थी। खेत, पशुधन और श्रम ही जीवन का आधार थे।
परंपरागत खेती केवल आजीविका नहीं, बल्कि जीवन संस्कृति थी। आज वही खेती बढ़ती लागत, महंगे बीज, खाद, दवाइयों और अनिश्चित मौसम के कारण घाटे का व्यापार बनती जा रही है। किसान का श्रम बढ़ा है, लेकिन स्थिरता और संतोष कम हुआ है।
यह कहानी केवल पुराने और नए समय की तुलना नहीं है।
यह उस परिवर्तन की कहानी है, जहां गांवों ने संघर्ष से आधुनिकता तक का सफर तय किया। सुविधाएं बढ़ीं, दूरी घटी, दुनिया करीब आई — लेकिन साथ ही आत्मनिर्भरता, सादगी और सामूहिक जीवन की कई खूबसूरत परंपराएं पीछे छूटती चली गईं।
फिर भी गांव आज भी भारत की आत्मा हैं।
जरूरत इस बात की है कि आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बनाया जाए, ताकि विकास भी हो और गांवों की आत्मीयता, संस्कृति और आत्मनिर्भरता भी बनी रहे।

निरंजन राय जी की स्मृतियों में बसता गांव

निरंजन राय जी की स्मृतियों में बसता गांव
समाज के सम्मानित वरिष्ठजन निरंजन राय जब अपने बचपन के दिनों को याद करते हैं, तो उनके शब्द केवल यादें नहीं लगते, बल्कि एक पूरे दौर की जीवंत तस्वीर बन जाते हैं।
वह दौर, जब गांव केवल रहने की जगह नहीं था — वह आत्मनिर्भरता, अपनापन और प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली का प्रतीक था।
निरंजन राय जी बताते हैं कि यह बात 1960 के शुरुआती दशक की है। उस समय खेती केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि परिवार और समाज की सामूहिक जीवन पद्धति थी। खेतों में हलवाहे बैलों से हल चलाते थे और घर से उनके लिए खाना लेकर जाना बच्चों की जिम्मेदारी और गर्व दोनों होता था। उस छोटे से काम में भी अपनापन और सम्मान छिपा रहता था। खेत, किसान, बैल और परिवार — सब एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए थे।
गेहूं की फसल कटने के बाद “दवांरी” का समय आता था। बैलों द्वारा फसल मड़ाई की जाती थी। खेतों में धूल उड़ती थी, बैलों की घंटियों की आवाज गूंजती थी और पूरा वातावरण श्रम और उत्सव का अद्भुत संगम बन जाता था। उस समय मशीनें नहीं थीं, लेकिन लोगों के चेहरों पर थकान कम और संतोष अधिक दिखाई देता था।
गर्मी के दिनों की यादें तो आज भी उनके मन को सबसे अधिक भावुक कर देती हैं। गांव के बगीचों में दोस्तों और भाइयों के साथ आम तोड़ने जाना किसी त्योहार से कम नहीं होता था। बच्चे पेड़ों की डालियों को जोर-जोर से हिलाते थे और पके हुए आम जमीन पर टप-टप गिरते थे। फिर सब मिलकर उन्हें बीनते, बाल्टी भरते और वहीं बैठकर रस से भरे आम चूस-चूसकर खाते थे।
निरंजन राय जी मुस्कुराते हुए कहते हैं —
“उस समय कोई गिनती नहीं होती थी कि कितने आम खाए। घर का बगीचा था, जितना मन करे उतना खाओ। वह स्वाद किसी अमृत से कम नहीं था।”
आज जब शहरों में आम खरीदकर खाने पड़ते हैं, तो पहले जेब देखनी पड़ती है, फिर आम। स्वाद शायद आज भी वही हो, लेकिन वह अपनापन, वह बेफिक्री और वह सामूहिक आनंद अब कहीं खो गया है।
उनकी स्मृतियों में एक और छोटी-सी लेकिन बेहद खास खुशी बसती है — साइकिल चलाने की।
जिस दिन बाबू जी स्कूल नहीं जाते थे और साइकिल घर पर रहती थी, उस दिन साइकिल चलाने का अवसर मिल जाता था। उस समय वह आनंद ऐसा लगता था मानो कोई हवाई जहाज उड़ा रहा हो। छोटी-छोटी खुशियां ही उस दौर की सबसे बड़ी दौलत थीं।
निरंजन राय जी कहते हैं कि गांव छोड़े हुए लगभग 60 वर्ष हो चुके हैं। आजीविका की तलाश उन्हें शहर ले आई, जीवन बदल गया, समय बदल गया, लेकिन गांव की वे तस्वीरें आज भी उनकी आंखों में वैसी ही ताजा हैं।
वह आज भी साल में कभी-कभी गांव जाते हैं, लेकिन अब उन्हें वह पुराना गांव दिखाई नहीं देता।
न वे पुराने बगीचे रहे,
न वैसी चौपालें,
न वैसा सामूहिक जीवन,
और न ही वह सहज मानवीय अपनापन।
आधुनिकता और विकास की दौड़ ने सुविधाएं तो दीं, लेकिन गांवों की आत्मा कहीं पीछे छूटती चली गई।
यह केवल निरंजन राय जी की कहानी नहीं है।
यह उस पूरी पीढ़ी की कहानी है जिसने मिट्टी से उठकर शहरों तक का सफर तय किया, लेकिन अपने भीतर आज भी गांव की खुशबू, बैलों की घंटियां, आम के बगीचे और बचपन की मासूम खुशियों को संजोए रखा है।

बाजार पर बढ़ती निर्भरता — खोती परम्पराएँ और बिखरता ज्ञान

बाजार पर बढ़ती निर्भरता — खोती परम्पराएँ और बिखरता ज्ञान
हम धीरे-धीरे केवल अपनी परम्पराएँ ही नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों का वह तकनीकी ज्ञान भी भूलते जा रहे हैं जिसने सदियों तक भारतीय समाज को आत्मनिर्भर बनाए रखा।
सच तो यह है कि आधुनिकता और बाजारवाद की दौड़ में हम अपनी जड़ों से लगभग कट चुके हैं।
एक समय था जब गांवों और घरों में उपयोग होने वाली अधिकांश वस्तुएँ लोग स्वयं बना लेते थे। हमारे पूर्वज केवल किसान नहीं थे, वे कुशल कारीगर, तकनीकी जानकार और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीवन जीने वाले लोग थे।
घर में उपयोग होने वाले लगभग 90 प्रतिशत सामान स्थानीय संसाधनों और घरेलू कौशल से तैयार हो जाते थे।
खटिया, मचिया, लकड़ी के उपकरण, खेती के औजार — सब गांवों में ही बन जाते थे। लोग स्वयं इन्हें बनाने में दक्ष होते थे। हर गांव में ऐसे कारीगर होते थे जिनके हाथों में कला और अनुभव बसता था।
कुश से कुरुई बनाना, गेहूं के डंठल से हाथ का पंखा तैयार करना, पुराने कपड़ों से गोदड़ी बनाना — ये केवल घरेलू काम नहीं थे, बल्कि एक जीवंत तकनीकी और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा थे।
बैठक के लिए मड़ई बनाना भी सामूहिक सहयोग का उदाहरण था। गांव के लोग मिलकर लकड़ी, घास और मिट्टी से सुंदर और उपयोगी संरचनाएँ तैयार कर लेते थे। इसमें न किसी बड़े खर्च की आवश्यकता होती थी और न ही बाजार पर निर्भरता की।
यह केवल वस्तुएँ बनाने का ज्ञान नहीं था, बल्कि आत्मनिर्भर जीवन जीने की कला थी।
खाद्य पदार्थों के संरक्षण और प्रसंस्करण में भी हमारे पूर्वज अत्यंत कुशल थे। कृषि उत्पादों से घर में ही अनेक उपयोगी चीजें तैयार हो जाती थीं।
अचार, बड़ी, तिलोड़ी, पापड़, गुड़, राब (तरल गुड़), सत्तू और कई प्रकार के पारंपरिक खाद्य पदार्थ घरों में ही बनाए और सुरक्षित रखे जाते थे। यह केवल भोजन नहीं था, बल्कि स्वास्थ्य, बचत और आत्मनिर्भरता का हिस्सा था।
लेकिन समय के साथ यह पूरी व्यवस्था बदलने लगी।
आधुनिकता, बाजार और उपभोक्तावाद के बढ़ते प्रभाव ने लोगों को धीरे-धीरे बाजार पर निर्भर बना दिया।
जो चीजें कभी घर में बन जाती थीं, वे अब दुकानों से खरीदी जाने लगीं।
नई पीढ़ी ने इन पारंपरिक कौशलों को सीखना बंद कर दिया।
अब बहुत से बच्चों को यह भी पता नहीं कि खटिया कैसे बनाई जाती है, गोदड़ी कैसे तैयार होती है या राब कैसे बनती है।
जो जातिगत कारीगर पीढ़ियों से इन कलाओं और तकनीकों को जीवित रखे हुए थे, उनका काम भी धीरे-धीरे समाप्त होने लगा।
क्योंकि जब लोग बाजार से तैयार सामान खरीदने लगे, तो स्थानीय कारीगरों की आवश्यकता कम होती चली गई।
परिणाम यह हुआ कि केवल रोजगार ही नहीं खत्म हुआ, बल्कि सदियों का अनुभव, तकनीकी ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत भी कमजोर पड़ गई।
हम यह मानने लगे कि तकनीक केवल आधुनिक मशीनों और फैक्ट्रियों में होती है, जबकि सच यह है कि हमारे गांवों में भी अद्भुत तकनीकी समझ मौजूद थी।
वह तकनीक प्रकृति के अनुकूल थी, कम खर्चीली थी और समाज को आत्मनिर्भर बनाती थी।
आज स्थिति यह है कि हम छोटी-छोटी आवश्यकताओं के लिए भी बाजार पर निर्भर हो गए हैं।
हमारे घरों में सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन कौशल कम हुए हैं।
सामान बढ़े हैं, लेकिन आत्मनिर्भरता घट गई है।
यह केवल परम्पराओं के खोने की कहानी नहीं है।
यह उस समाज की कहानी है जो निर्माता से उपभोक्ता बनता जा रहा है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने पूर्वजों के ज्ञान को केवल “पुरानी बातें” समझकर न छोड़ दें।
उनमें आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय रोजगार और सामुदायिक सहयोग की गहरी समझ छिपी हुई थी।
यदि हम आधुनिक शिक्षा के साथ पारंपरिक कौशल और स्थानीय तकनीकी ज्ञान को भी बचा लें, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल बाजार पर निर्भर उपभोक्ता नहीं रहेंगी, बल्कि सृजनकर्ता और आत्मनिर्भर नागरिक बन सकेंगी।
— संजय शर्मा

बदलते समय में खोती हुई गांव की सामूहिक संस्कृति

बदलते समय में खोती हुई गांव की सामूहिक संस्कृति
बचपन की गर्मियों की छुट्टियाँ आज भी यादों में वैसे ही ताज़ा हैं, जैसे गांव की सुबह की हवा। खासकर घर में जब किसी की शादी होती थी, तब पूरा गांव जैसे एक परिवार बन जाता था।
शादी केवल एक परिवार का आयोजन नहीं होती थी, बल्कि पूरे गांव का उत्सव होती थी। उसमें हर व्यक्ति की भूमिका होती थी और बच्चों की भी अपनी जिम्मेदारियाँ तय रहती थीं। हमारी सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक थी – मेहमानों के सोने और बैठने के लिए खटिया और बिस्तर की व्यवस्था करना।
गांव में एक सुंदर परंपरा थी। शादी वाले घर के लोग आसपास के घरों से एक-एक खटिया, गद्दा, चद्दर और तकिया लाते थे। यह केवल सामान जुटाने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि सामाजिक जुड़ाव और आत्मीयता का माध्यम था।
जब हम बच्चे समूह बनाकर खटिया लेने किसी घर जाते थे, तो वहां के लोग बड़े अपनत्व से पूछते थे –
“किसके घर का लड़का है?”
“कहाँ रहता है?”
“किस कक्षा में पढ़ता है?”
उस समय ये बातें सामान्य सवाल लगती थीं, लेकिन आज सोचता हूँ तो महसूस होता है कि वे केवल सवाल नहीं थे। वे संबंध जोड़ने का तरीका थे। उस बहाने लोग हमें पहचानते थे, हम उन्हें जानते थे। एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी से जुड़ती थी। गांव का हर बच्चा लगभग पूरे गांव का परिचित होता था।
इस परंपरा का एक बड़ा सामाजिक और आर्थिक महत्व भी था। शादी में आवश्यक चीजें मिल-बाँटकर हो जाती थीं, जिससे अनावश्यक खर्च नहीं होता था। आज जिन कामों में लाखों रुपये होटल, शादी भवन और टेंट हाउस पर खर्च होते हैं, वही काम पहले सामूहिक सहयोग से सहजता से हो जाता था।
मोहल्ले में यदि किसी के घर शादी होने वाली होती, तो लोग पहले से अपने घर में खटिया और बिस्तर संभालकर रखते थे। यदि किसी के पास कमी होती तो वह नई खटिया बनवा लेता, ताकि जरूरत पड़ने पर वह मदद कर सके। यह केवल वस्तु देना नहीं था, बल्कि “हम साथ हैं” का एहसास था।
इसी तरह शादी के मंडप के लिए गांव भर से बांस इकट्ठा किए जाते थे। खाना बनाने के लिए बड़े-बड़े बर्तन लोग अपने घरों से देते थे। महिलाएँ और पुरुष मिलकर खाना बनाते थे। अलग से किसी कैटरर या खाना बनाने वाले की जरूरत नहीं पड़ती थी। खाना बनाने से लेकर बारातियों को खिलाने तक की जिम्मेदारी गांव मिलकर निभाता था।
बैठक के लिए छप्पर बनाना, मंडप सजाना, मेहमानों के ठहरने की व्यवस्था करना – ये सब सामूहिक श्रम और सहयोग के उदाहरण थे। काम का बोझ किसी एक परिवार पर नहीं पड़ता था। हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देता था और इसी कारण किसी को तनाव महसूस नहीं होता था।
सबसे सुंदर दृश्य तब होता था जब पूरी बारात को गांव के लोग मिलकर बैठाकर प्रेम से खाना खिलाते थे। उस भोजन में केवल स्वाद नहीं होता था, उसमें अपनापन, सम्मान और रिश्तों की मिठास भी होती थी।
गांव की ऐसी अनेक परंपराएँ थीं, जो बिना किसी औपचारिक योजना के सामाजिक सुरक्षा और सहयोग का मजबूत आधार बनाती थीं। वे लोगों को जोड़ती थीं, आर्थिक बोझ कम करती थीं और रिश्तों को गहरा बनाती थीं।
आज समय बदल गया है। शादियाँ होटल और मैरिज गार्डन में होने लगी हैं। सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन लोगों के बीच की नजदीकियाँ कम होती जा रही हैं। अब काम तो जल्दी हो जाते हैं, लेकिन उनमें वह सामूहिकता, वह आत्मीयता और वह अपनापन धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है।
पहले और आज के समय में यही सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है —
पहले संसाधन कम थे, लेकिन लोग एक-दूसरे के बहुत करीब थे।
आज संसाधन अधिक हैं, लेकिन लोग एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं।
शायद गांव की उन परंपराओं का सबसे बड़ा मूल्य यही था कि वे हमें यह सिखाती थीं —
“सामूहिक सहयोग केवल काम आसान नहीं करता, बल्कि समाज को भी मजबूत बनाता है।”
संजय शर्मा

Wednesday, 27 May 2026

The Story of a Changing Lifestyle

The Story of a Changing Lifestyle
Our ancestors were wise, far-sighted, and deeply connected to the laws of nature. They valued stability, self-reliance, and collective prosperity above all else. That is why they considered agriculture not merely a source of income, but the very foundation of life.
They cultivated land, protected natural resources, and embraced farming so that no family member would remain unemployed, no one would sleep hungry, and future generations could live with dignity and respect.
Owning land and practicing their own farming meant ownership and independence.
They were the owners of their fields, the owners of their labor, and the owners of their livelihoods. They did not need to work under someone else. They were self-reliant and self-sufficient.
Agriculture was not just the support system of one family; it sustained entire communities. Carpenters, blacksmiths, potters, shepherds, weavers, laborers — the whole rural social and economic structure was interconnected. Villages functioned as self-sufficient units.
Most importantly, our ancestors never harmed nature in the name of development.
Their homes were built with मिट्टी, wood, and natural materials that were environmentally friendly. Farming practices protected soil fertility, conserved water, supported livestock, and safeguarded human health. There was a natural balance between human life and the environment.
Today, governments encourage people to become “self-reliant” and “independent.” But the truth is that our ancestors were already living that way.
Through their labor, resources, and community cooperation, they created a lifestyle that offered both dignity and freedom.
The real change began when modernity and urban glamour started attracting people. Gradually, the desire for higher income, more comforts, and a so-called modern lifestyle began to grow.
People started leaving villages and migrating toward cities.
Those who were once owners of their own land slowly became employees working for others. Families that once provided employment to many are now struggling to find jobs for themselves.
People who once controlled their own time and labor are now forced to work like machines according to fixed schedules.
Village homes may have been simple, but they were spacious and full of life. Entire families lived together under one roof — grandparents, parents, siblings, and relatives. Relationships were strong, and life carried emotional warmth and peace.
But as people moved to cities, life became increasingly limited.
Today, many people live in small apartments or single rooms, often with only one or two family members. Comforts increased, but emotional connection decreased. Income may have increased, but mental peace was left behind somewhere along the way.
The very cities people moved to in search of glamour and opportunity slowly turned them into machines.
From morning to evening, life became a cycle of rush, stress, pollution, and loneliness — the defining reality of modern urban living.
This is not merely a story about villages and cities.
It is the story of a transformation in which humanity moved from self-reliance to dependence, from being owners to becoming laborers, and from living close to nature to drifting away from it.
Today, there is a strong need to rediscover the wisdom of our ancestors, their lifestyle, and their self-sustaining models of living.
Modernity is important, but not at the cost of losing our roots.
True prosperity can only be achieved when development is balanced with nature, family values, community bonding, and self-respect.
— Sanjay Sharma

मालिक से मजदूर तक — बदलती जीवनशैली की कहानी

मालिक से मजदूर तक — बदलती जीवनशैली की कहानी
हमारे पूर्वज अत्यंत सुलझे हुए, दूरदर्शी और प्रकृति के नियमों को समझने वाले लोग थे। उन्होंने जीवन में स्थायित्व, आत्मनिर्भरता और सामूहिक समृद्धि को सबसे अधिक महत्व दिया। यही कारण था कि उन्होंने खेती को केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार बनाया।
उन्होंने खेत बनाए, भूमि को संजोया और कृषि को अपनाया ताकि परिवार का कोई सदस्य बेरोजगार न रहे, कोई भूखा न सोए और आने वाली पीढ़ियाँ सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें।
स्वयं की भूमि, स्वयं की खेती — इसका अर्थ था मालिकाना हक।
वे अपने खेत के मालिक थे, अपने श्रम के मालिक थे और अपने रोजगार के भी मालिक थे। उन्हें किसी की नौकरी करने की आवश्यकता नहीं थी। वे आत्मनिर्भर थे, स्वावलंबी थे।
खेती केवल एक परिवार का सहारा नहीं थी। कृषि पर आश्रित अनेक अन्य समुदायों की आजीविका भी इसी व्यवस्था से चलती थी। बढ़ई, लोहार, कुम्हार, चरवाहे, बुनकर, मजदूर — गांव की पूरी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था एक-दूसरे से जुड़ी हुई थी। गांव आत्मनिर्भर इकाइयाँ थे।
सबसे बड़ी बात यह थी कि हमारे पूर्वजों ने विकास के नाम पर प्रकृति को नुकसान नहीं पहुँचाया।
उनके घर मिट्टी, लकड़ी और प्राकृतिक संसाधनों से बनते थे, जो पर्यावरण के अनुकूल होते थे। खेती भी ऐसी होती थी जिसमें मिट्टी की उर्वरता, जल संरक्षण, पशुधन और मानव स्वास्थ्य — सभी का ध्यान रखा जाता था। जीवन और प्रकृति के बीच संतुलन बना हुआ था।
आज सरकारें लोगों को “आत्मनिर्भर” और “स्वावलंबी” बनने का संदेश दे रही हैं। लेकिन सच यह है कि हमारे पूर्वज पहले से ही आत्मनिर्भर थे।
उन्होंने अपने श्रम, संसाधनों और सामुदायिक सहयोग से ऐसा जीवन बनाया था जिसमें सम्मान भी था और स्वतंत्रता भी।
समस्या तब शुरू हुई जब आधुनिकता और शहरी चकाचौंध का आकर्षण बढ़ने लगा। धीरे-धीरे लोगों के भीतर अधिक कमाने, अधिक सुविधाएँ पाने और तथाकथित आधुनिक जीवन जीने की लालसा बढ़ी।
लोग गांव छोड़कर शहरों की ओर जाने लगे।
जो लोग कभी अपने खेतों के मालिक थे, वे धीरे-धीरे दूसरों के यहाँ नौकरी करने लगे।
जो पूर्वज कभी चार लोगों को काम देते थे, आज उनकी आने वाली पीढ़ियाँ स्वयं रोजगार की तलाश में भटक रही हैं।
जो लोग कभी अपने समय और श्रम के मालिक थे, वे आज मशीनों की तरह तय समय पर काम करने को मजबूर हैं।
गांव में भले ही कच्चे मकान होते थे, लेकिन वे बड़े होते थे — जिनमें पूरा परिवार साथ रहता था।
दादा-दादी, माता-पिता, भाई-बहन, रिश्तेदार — सब एक छत के नीचे रहते थे।
संबंधों में अपनापन था, जीवन में सुकून था।
लेकिन शहरों में आते-आते जीवन सिमट गया।
अब लोग छोटे-छोटे कमरों और फ्लैटों में अकेले या केवल दो लोगों के साथ रह गए हैं।
सुविधाएँ बढ़ीं, लेकिन अपनापन कम हो गया।
कमाई बढ़ी, लेकिन मानसिक शांति कहीं पीछे छूट गई।
जिस चमक-दमक के आकर्षण में लोग गांव छोड़कर शहर आए थे, उसी शहर में वे धीरे-धीरे मशीन बनकर रह गए।
सुबह से शाम तक भागदौड़, तनाव, प्रदूषण और अकेलापन — यही आधुनिक जीवन की पहचान बनती जा रही है।
यह कहानी केवल गांव और शहर की नहीं है।
यह कहानी उस बदलाव की है जिसमें इंसान ने आत्मनिर्भरता से निर्भरता की ओर, मालिक से मजदूर बनने की ओर और प्रकृति से दूर जाने की ओर कदम बढ़ाए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने पूर्वजों के ज्ञान, उनकी जीवनशैली और उनके आत्मनिर्भर मॉडल को समझें।
आधुनिकता जरूरी है, लेकिन अपनी जड़ों से कटकर नहीं।
यदि विकास के साथ प्रकृति, परिवार, समुदाय और आत्मसम्मान को जोड़ा जाए, तभी सच्चे अर्थों में समृद्ध समाज का निर्माण हो सकेगा।

‘अदहन’: पूर्वांचल की रसोई में बसा एक पारंपरिक शब्द

‘अदहन’: पूर्वांचल की रसोई में बसा एक पारंपरिक शब्द “दाल के लिए अदहन चढ़ा दो।” पूर्वांचल के गांवों में कभी यह वाक्य घर की रसोई मे...