Thursday, 24 September 2026

यूथ चैंपियन–स्वराज संवाद

दिनांक: 22 सितंबर 2026 | माध्यम: ऑनलाइन
प्रतिभागिता: 6 जिलों से 10 युवा
बैठक का उद्देश्य
“स्वराज के विचारों को कैसे मजबूत करें और संवाद को कैसे प्रभावी बनाएं?” इस विषय को केंद्र में रखते हुए 22 सितंबर 2026 को यूथ चैंपियन–स्वराज संवाद की पहली ऑनलाइन बैठक आयोजित की गई। बैठक का उद्देश्य प्रतिभागियों का परिचय, समूह के उद्देश्य को समझना, स्वराज संवाद की अवधारणा तथा उसमें युवाओं की भूमिका पर चर्चा करना था।
तकनीकी कारणों से बैठक लगभग 30 मिनट की देरी से शुरू हुई, लेकिन सभी प्रतिभागियों ने सक्रियता के साथ चर्चा में भाग लिया।
स्वराज संवाद की अवधारणा
बैठक में अनमोल फाउंडेशन के संजय शर्मा ने बताया कि बग्धरा संस्थान, राजस्थान द्वारा शुरू की गई “स्वराज संवाद” पहल का उद्देश्य देश के विभिन्न क्षेत्रों में समुदायों के बीच मौजूद पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय अनुभवों और सकारात्मक स्वैच्छिक प्रयासों को पहचानना, दस्तावेजीकृत करना और साझा मंच पर लाना है।
इसमें विशेष रूप से पारंपरिक कृषि, बीज संरक्षण, मिट्टी एवं जल संरक्षण, स्वास्थ्य, खाद्य प्रणाली, पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय आजीविका और प्रकृति-अनुकूल जीवनशैली जैसे विषयों को शामिल किया गया है।
स्वराज संवाद का उद्देश्य केवल जानकारी एकत्र करना नहीं, बल्कि एक-दूसरे के अनुभवों से सीखना और उपयोगी ज्ञान को व्यवहार में लाना है।
युवाओं की भूमिका
बैठक में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि युवा इस प्रक्रिया के महत्वपूर्ण वाहक बन सकते हैं। उन्हें—
नेतृत्व विकास
लेखन एवं कहानी लेखन
फोटो एवं वीडियो डॉक्यूमेंटेशन
डिजिटल कम्युनिकेशन
स्थानीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण
समुदाय के साथ संवाद
जैसे कौशलों से सशक्त बनाने की आवश्यकता है।
बैठक में युवाओं ने अपने-अपने क्षेत्र के कार्यों एवं अनुभव साझा किए। इनमें टीबी जागरूकता, आजीविका, अधिकार आधारित कार्य, बकरी एवं मुर्गीपालन, मछलीपालन, वृक्षारोपण, मशरूम उत्पादन और सामुदायिक जागरूकता जैसे प्रयास शामिल थे।
बग्धरा संस्थान का अनुभव
बग्धरा संस्थान के सुदीप शर्मा ने राजस्थान तथा मध्यप्रदेश और गुजरात के सीमावर्ती क्षेत्रों में भील समुदाय के साथ संस्था के कार्यों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कृषि, भूमि सुधार, बीज संरक्षण, स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला एवं बाल विकास तथा पारंपरिक जीवनशैली से जुड़े प्रयासों के अनुभवों को स्वराज संवाद के माध्यम से व्यापक स्तर पर साझा किया जा रहा है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वराज संवाद किसी एक संस्था की यात्रा नहीं, बल्कि युवाओं, समुदायों और स्वैच्छिक संस्थाओं की साझा यात्रा है।
स्थानीय ज्ञान और बदलता ग्रामीण समाज
चर्चा में गांवों में बढ़ते बाजार प्रभाव, युवाओं के पलायन, पारंपरिक आजीविका एवं खेती के तरीकों में बदलाव तथा स्थानीय ज्ञान के कमजोर पड़ने जैसे मुद्दों पर भी विचार हुआ।
प्रतिभागियों ने माना कि गांवों और आदिवासी समुदायों के पास प्राकृतिक संसाधनों, कृषि, भोजन, स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़ा महत्वपूर्ण पारंपरिक ज्ञान मौजूद है। इसे पहचानने, संरक्षित करने और नई पीढ़ी से जोड़ने की आवश्यकता है।
स्वराज लर्निंग सिस्टम
बैठक में “स्वराज लर्निंग सिस्टम” नामक वेब पोर्टल की जानकारी भी साझा की गई, जो निर्माणाधीन है। इसके माध्यम से विभिन्न राज्यों से प्राप्त स्थानीय ज्ञान, Best Practices और सकारात्मक कहानियों को एक डिजिटल मंच पर उपलब्ध कराने की योजना है।
आगे की कार्ययोजना
बैठक में निम्न दिशा में आगे बढ़ने पर सहमति बनी—
प्रत्येक माह ऑनलाइन संवाद आयोजित करना।
प्रत्येक 3 या 6 माह में फिजिकल वर्कशॉप आयोजित करना।
अधिक से अधिक सकारात्मक सोच वाले युवाओं को समूह से जोड़ना।
लेखन, नेतृत्व एवं ऑडियो-वीडियो डॉक्यूमेंटेशन के प्रशिक्षण आयोजित करना।
क्षेत्रीय भ्रमण के माध्यम से समुदायों से सीधे संवाद करना।
स्थानीय ज्ञान एवं Best Practices को दस्तावेजीकृत कर साझा करना।
निष्कर्ष
बैठक में यह महत्वपूर्ण विचार उभरकर सामने आया कि—
“युवा स्वयं जानकारी की खदान में बैठे हैं; जरूरत है उस जानकारी को समझने, संवाद के माध्यम से साझा करने और दस्तावेजीकृत करने की।”
पहली बैठक ने विभिन्न जिलों के युवाओं को एक साझा मंच पर जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण शुरुआत की। सभी प्रतिभागियों ने इस पहल को आगे बढ़ाने, नए युवाओं को जोड़ने और नियमित संवाद बनाए रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।
स्वराज संवाद की दिशा — स्थानीय ज्ञान से संवाद, संवाद से सीख और सीख से युवा नेतृत्व एवं सामुदायिक सशक्तिकरण।
उम्मीद है कि यह प्रयास आने वाले समय में गांव-गांव और जन-जन तक पहुंचेगा।

Tuesday, 22 September 2026

Raipur Dialogue: शासन और NGOs के बीच सहयोग की नई पहल

Raipur Dialogue: शासन और NGOs के बीच सहयोग की नई पहल
रायपुर डायलॉग कार्यक्रम के अंतर्गत जिला प्रशासन, रायपुर द्वारा NGOs के प्रतिनिधियों के साथ एक महत्वपूर्ण संवाद एवं बैठक आयोजित की गई। बैठक का उद्देश्य शासन की विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी, परिणाममूलक एवं जन-केंद्रित बनाने के लिए NGOs के अनुभव, सुझाव और सहभागिता को समझना था।
बैठक में विशेष रूप से कुपोषण (Malnutrition), आजीविका, युवा विकास (Youth Development) सहित विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।
जिला कलेक्टर ने शासन द्वारा किए जा रहे विभिन्न प्रयासों और प्राथमिकताओं पर खुलकर विचार साझा किए तथा NGOs से नए एवं व्यवहारिक विचारों के साथ जुड़कर योजनाओं को जमीनी स्तर पर अधिक प्रभावी बनाने में सहयोग का आह्वान किया।
बैठक में पुरानी कॉपियाँ-किताबें, बच्चों के खिलौने एवं उपयोगी कपड़ों के संग्रह से संबंधित अभियान की जानकारी भी साझा की गई। जिला प्रशासन द्वारा इस दिशा में अभियान चलाकर सामग्री एकत्र की जा रही है। इच्छुक NGOs को इस पहल से जुड़कर इसके संग्रह एवं संचालन में सहयोग करने का आग्रह किया गया।
इसी प्रकार बाल कुपोषण की चुनौती से निपटने के लिए आंगनबाड़ियों के साथ सहयोग पर भी विशेष चर्चा हुई। यह विचार रखा गया कि यदि एक NGO एक आंगनबाड़ी को सहयोग एवं मार्गदर्शन के लिए अपनाता है, तो स्थानीय स्तर पर पोषण, जागरूकता और बच्चों के विकास से जुड़े अनेक परिणाममूलक कार्य किए जा सकते हैं।
बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि ‘रायपुर डायलॉग’ का आयोजन प्रत्येक माह की 22 तारीख को किया जाएगा, जिससे जिला प्रशासन और NGOs के बीच नियमित संवाद, अनुभवों का आदान-प्रदान तथा साझा प्रयासों को निरंतर आगे बढ़ाया जा सके।
NGOs के प्रतिनिधियों ने जिला प्रशासन की इस पहल की सराहना करते हुए शासन के साथ मिलकर सामाजिक विकास के विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग करने का आश्वासन दिया।
सार्थक संवाद → साझा रणनीति → सामूहिक प्रयास → बेहतर परिणाम
ऐसे नियमित संवाद शासन, नागरिक समाज और समुदाय के बीच साझेदारी को मजबूत करने तथा विकास कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
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Sunday, 20 September 2026

Smart Agriculture, IoT, AI एवं Precision Farming : संभावनाएँ, चुनौतियाँ और कार्ययोजना

भारत एवं छत्तीसगढ़ के संदर्भ में स्मार्ट कृषि
Smart Agriculture, IoT, AI एवं Precision Farming : संभावनाएँ, चुनौतियाँ और कार्ययोजना
1. कार्यकारी सारांश
भारतीय कृषि वर्तमान समय में एक महत्वपूर्ण तकनीकी संक्रमण के दौर से गुजर रही है। जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, घटते जल संसाधन, बढ़ती कृषि लागत, श्रम की उपलब्धता, छोटे एवं खंडित खेत, मिट्टी की उर्वरता में कमी तथा बाजार संबंधी जोखिमों के बीच स्मार्ट कृषि (Smart Agriculture) किसानों को अधिक वैज्ञानिक, संसाधन-कुशल और जलवायु-अनुकूल खेती की दिशा में ले जा सकती है।
स्मार्ट कृषि में Internet of Things (IoT), Artificial Intelligence (AI), मशीन लर्निंग, ड्रोन, रिमोट सेंसिंग, GIS, GPS, सैटेलाइट इमेजरी, मृदा एवं मौसम सेंसर, ऑटोमेशन और डिजिटल कृषि प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जाता है। इसका उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि सही समय पर सही मात्रा में पानी, खाद, बीज और पौध संरक्षण उपाय उपलब्ध कराना है।
भारत सरकार ने सितंबर 2024 में ₹2,817 करोड़ के परिव्यय के साथ Digital Agriculture Mission को मंजूरी दी। इसके प्रमुख घटकों में AgriStack, Krishi Decision Support System (KDSS), Soil Profile Mapping और Digital Crop Survey शामिल हैं। �
Press Information Bureau +1
छत्तीसगढ़ में स्मार्ट कृषि की आवश्यकता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। राज्य में लगभग 37.46 लाख किसान हैं और लगभग 80% किसान छोटे एवं सीमांत श्रेणी में आते हैं। राज्य का लगभग 4.78 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र खेती के अंतर्गत है तथा ICAR के अनुसार शुद्ध सिंचित क्षेत्र खेती के लगभग 23% के बराबर है। प्रमुख फसलों में धान, गेहूं, मोटे अनाज, दलहन और तिलहन शामिल हैं। �
Natural Farming +1
इसलिए छत्तीसगढ़ में स्मार्ट कृषि का मॉडल बड़े पूंजी-प्रधान फार्मों के बजाय छोटे किसानों, FPO, सहकारी समितियों, Custom Hiring Centres, कृषि सेवा केंद्रों और ग्राम-स्तरीय सामुदायिक संस्थाओं पर आधारित होना अधिक व्यावहारिक होगा।
2. स्मार्ट कृषि क्या है?
स्मार्ट कृषि ऐसी कृषि प्रणाली है जिसमें डिजिटल एवं वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से खेत, मिट्टी, पानी, मौसम, फसल और बाजार से संबंधित जानकारी एकत्र की जाती है तथा उसके आधार पर कृषि संबंधी निर्णय लिए जाते हैं।
इसे सरल रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है:
Data → Analysis → Decision → Action → Monitoring
अर्थात—
डेटा एकत्र करें → उसका विश्लेषण करें → निर्णय लें → खेत में कार्रवाई करें → परिणाम की निगरानी करें।
Precision Farming इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ICAR के अनुसार precision farming में GIS, remote sensing, GPS और satellite technologies जैसी space technologies का उपयोग करके कृषि उत्पादकता और संसाधन उपयोग को अधिक टिकाऊ बनाया जा सकता है। �
Indian Council of Agricultural Research
3. स्मार्ट कृषि की प्रमुख तकनीकें
3.1 Internet of Things – IoT
IoT में खेत में लगे विभिन्न सेंसर और उपकरण इंटरनेट अथवा अन्य संचार नेटवर्क से जुड़े होते हैं।
उदाहरण:
Soil Moisture Sensor
Temperature Sensor
Humidity Sensor
Rain Gauge
Weather Station
Water Flow Sensor
Automatic Pump Controller
Camera
Smart Valve
इनसे प्राप्त जानकारी मोबाइल या कंप्यूटर पर उपलब्ध हो सकती है।
उदाहरण
यदि मिट्टी में नमी निर्धारित स्तर से नीचे जाती है तो:
Sensor → Mobile/Control Unit → Pump → Irrigation → Sensor Feedback
के माध्यम से सिंचाई को स्वचालित किया जा सकता है।
ICAR ने IoT आधारित soil-moisture irrigation scheduling तथा sensor-based irrigation जैसी तकनीकों पर काम किया है। एक ICAR विकसित IoT-enabled soil-moisture system ने पारंपरिक irrigation scheduling की तुलना में 10–15% पानी बचाने की क्षमता प्रदर्शित की। �
Indian Council of Agricultural Research
4. स्मार्ट सिंचाई
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में स्मार्ट सिंचाई का विशेष महत्व है, क्योंकि खेती का बड़ा हिस्सा वर्षा पर निर्भर है।
प्रमुख तकनीकें
Soil Moisture Sensor
Drip Irrigation
Sprinkler Irrigation
Automated Pump
Smart Valve
Weather-based Irrigation
Water Flow Meter
Mobile-based Irrigation Control
ICAR के अनुसार smart irrigation में soil moisture, weather information और crop requirement के आधार पर पानी देने से जल उपयोग दक्षता बढ़ाई जा सकती है। ICAR के एक हालिया प्रकाशन में smart irrigation systems के लिए 20–50% तक पानी बचत की संभाव्यता बताई गई है, हालांकि वास्तविक बचत फसल, मिट्टी, सिंचाई पद्धति और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। �
Indian Council of Agricultural Research
इसलिए आपकी मूल सामग्री में दिए गए 30–40% पानी बचत के आंकड़े को सार्वभौमिक परिणाम की तरह नहीं, बल्कि संभावित/परिस्थिति-निर्भर परिणाम के रूप में प्रस्तुत करना अधिक वैज्ञानिक होगा।
5. मृदा स्वास्थ्य एवं Soil Sensors
स्मार्ट कृषि में मिट्टी को केवल "खेत की जमीन" नहीं बल्कि एक डेटा-सिस्टम के रूप में देखा जाता है।
सेंसर अथवा डिजिटल soil-testing technologies से निम्न जानकारी प्राप्त की जा सकती है:
Soil Moisture
Soil Temperature
pH
Electrical Conductivity
Nitrogen
Phosphorus
Potassium
अन्य पोषक तत्वों की स्थिति
हालांकि NPK sensors से प्राप्त डेटा की accuracy सेंसर के प्रकार और calibration पर निर्भर करती है। इसलिए महंगे या महत्वपूर्ण fertilizer decisions में laboratory soil testing + sensor data को साथ उपयोग करना अधिक उचित होगा।
भारत सरकार का Digital Agriculture Mission भी व्यापक Soil Fertility & Profile Mapping को डिजिटल कृषि ढांचे का हिस्सा बना रहा है। �
Press Information Bureau +1
6. ड्रोन आधारित स्मार्ट कृषि
कृषि ड्रोन का उपयोग कई क्षेत्रों में किया जा सकता है:
निगरानी
फसल क्षेत्र का सर्वेक्षण
पौधों की स्थिति देखना
रोग/कीट प्रभावित क्षेत्र पहचानना
water stress की पहचान
crop stand assessment
Precision Spraying
उर्वरक
जैविक inputs
अनुमोदित crop-protection chemicals
का targeted application किया जा सकता है।
ICAR ने UAV/drone आधारित crop acreage assessment, foliar application और crop-health monitoring जैसी तकनीकों पर कार्य किया है। �
Indian Council of Agricultural Research
भारत में Namo Drone Didi योजना के तहत महिला SHGs को कृषि ड्रोन आधारित सेवाओं से जोड़ने की पहल की गई है। सरकार ने 2023-24 से 2025-26 के दौरान 15,000 drones उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा था। �
Press Information Bureau
7. Artificial Intelligence – AI
AI स्मार्ट कृषि का "Decision Engine" बन सकता है।
AI का उपयोग निम्न क्षेत्रों में किया जा सकता है:
Crop Disease Detection
मोबाइल कैमरे से पत्ते की तस्वीर लेकर संभावित रोग की पहचान।
Pest Prediction
मौसम, फसल अवस्था और पूर्व डेटा के आधार पर कीट प्रकोप की संभावना का अनुमान।
Yield Prediction
मौसम, soil, crop condition और historical data के आधार पर उत्पादन का अनुमान।
Weather Advisory
स्थानीय मौसम के आधार पर:
बुवाई
सिंचाई
छिड़काव
कटाई
के लिए सलाह।
Market Advisory
बाजार मूल्य, मांग और उपलब्धता के आधार पर किसान को जानकारी उपलब्ध कराना।
8. छत्तीसगढ़ में AI आधारित कृषि का उदाहरण
छत्तीसगढ़ के लिए AI आधारित कृषि सलाह की संभावनाएँ केवल सैद्धांतिक नहीं हैं।
Indira Gandhi Krishi Vishwavidyalaya (IGKV), Raipur द्वारा विकसित Crop Doctor/AI आधारित farmer service में pest एवं disease identification, weather forecast, farming advisories, market access तथा expert advisory जैसी सुविधाएँ शामिल हैं। इसकी वेबसाइट पर लगभग 7.60 लाख registered farmers और लगभग 3 लाख app downloads का उल्लेख है। �
Indira Gandhi Krishi Vishwavidyalaya
यह छत्तीसगढ़ में स्थानीय भाषा एवं स्थानीय कृषि परिस्थितियों के अनुरूप digital agriculture विकसित करने की महत्वपूर्ण दिशा हो सकती है।
9. Smart Weather Station
किसान के लिए केवल जिला स्तर का मौसम पूर्वानुमान पर्याप्त नहीं होता।
एक micro-weather station निम्न डेटा दे सकता है:
Temperature
Relative Humidity
Rainfall
Wind Speed
Wind Direction
Solar Radiation
Leaf Wetness
Soil Temperature
इसका उपयोग:
"आज सिंचाई करें या नहीं?"
"आज spray करना उचित है या नहीं?"
"बारिश से पहले harvesting करनी चाहिए या नहीं?"
जैसे निर्णयों में किया जा सकता है।
10. Smart Greenhouse
ग्रीनहाउस में IoT और automation का उपयोग करके:
तापमान
humidity
irrigation
fertigation
ventilation
lighting
को नियंत्रित किया जा सकता है।
यह तकनीक विशेष रूप से:
tomato
capsicum
cucumber
nursery
फूल
high-value vegetables
के लिए उपयोगी हो सकती है।
11. फसल स्वास्थ्य की निगरानी
Smart Camera + AI + Drone + Satellite imagery को एक साथ जोड़कर crop-health monitoring system विकसित किया जा सकता है।
उदाहरण
यदि किसी खेत में पौधों की पत्तियाँ सामान्य से अलग दिखाई देती हैं:
Camera/Drone → Image → AI Analysis → Risk Identification → Farmer Alert → Field Verification → Advisory
इससे पूरे खेत में एक जैसा chemical spray करने के बजाय समस्या वाले क्षेत्र पर targeted intervention संभव हो सकता है।
12. स्मार्ट कृषि और पारंपरिक ज्ञान का समन्वय
छत्तीसगढ़ के संदर्भ में स्मार्ट कृषि का अर्थ केवल आधुनिक मशीनों को खेत में लगाना नहीं होना चाहिए।
यहाँ महत्वपूर्ण है:
Modern Technology + Local Knowledge + Farmer Experience + Natural Resource Management
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और आदिवासी समुदायों में मौसम, मिट्टी, बीज, जैव विविधता, पारंपरिक कृषि, जल संरक्षण और स्थानीय पौधों से संबंधित व्यापक पारंपरिक ज्ञान मौजूद है।
इसलिए स्मार्ट कृषि का स्थानीय मॉडल इस प्रकार हो सकता है:
AI + IoT + Traditional Knowledge + Farmer Observation
उदाहरण के लिए, किसान के पारंपरिक मौसम संकेतों को स्थानीय weather-station data के साथ document और compare किया जा सकता है।
13. भारत में स्मार्ट कृषि की प्रमुख चुनौतियाँ
13.1 महंगी तकनीक
AI-enabled weather stations, drones, sensors, automation और sophisticated farm machinery छोटे किसानों के लिए महंगे हो सकते हैं।
इसलिए प्रत्येक किसान द्वारा individual ownership के बजाय:
Community Ownership / FPO Ownership / Custom Hiring
अधिक व्यावहारिक विकल्प हो सकता है।
13.2 छोटी एवं खंडित भूमि
भारत में छोटे और सीमांत किसानों की बड़ी संख्या होने के कारण large-scale precision farming equipment का individual उपयोग आर्थिक रूप से कठिन हो सकता है।
छत्तीसगढ़ में भी लगभग 80% किसान छोटे एवं सीमांत श्रेणी में हैं। �
Natural Farming
इसलिए:
"Technology as a Service"
का मॉडल महत्वपूर्ण होगा।
अर्थात किसान मशीन खरीदने के बजाय प्रति एकड़/प्रति सेवा भुगतान करे।
14. डिजिटल साक्षरता
किसान को केवल smartphone देना पर्याप्त नहीं है।
उसे समझना होगा:
App कैसे चलाएं?
Sensor data का अर्थ क्या है?
Weather alert का क्या मतलब है?
AI की सलाह को खेत की स्थिति से कैसे मिलाएं?
गलत/असामान्य data को कैसे पहचानें?
इसलिए Digital Agriculture Literacy Programme आवश्यक है।
15. भाषा की चुनौती
Smart Agriculture का सफल मॉडल तभी विकसित होगा जब technology:
हिंदी
छत्तीसगढ़ी
स्थानीय बोलियों
में सरल तरीके से उपलब्ध हो।
उदाहरण:
❌ "Soil moisture 18% — irrigation threshold reached."
की जगह:
"मिट्टी में नमी कम है। आज शाम सिंचाई की आवश्यकता हो सकती है।"
इस प्रकार की farmer-friendly advisory अधिक उपयोगी होगी।
16. इंटरनेट और बिजली
IoT आधारित कृषि के लिए:
mobile network
internet
electricity
solar power
device maintenance
आवश्यक हैं।
दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में solar-powered IoT devices + offline data storage + SMS/voice alerts का मॉडल अधिक उपयुक्त हो सकता है।
17. डेटा सुरक्षा और किसान की Data Ownership
Digital agriculture में किसान का डेटा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाएगा:
जमीन
crop
soil
उत्पादन
irrigation
मौसम
farm practices
livestock
भारत के Digital Agriculture Mission में AgriStack को federated structure में विकसित किया जा रहा है और सरकार ने बताया है कि data privacy को DPDP Act, 2023 के संदर्भ में ध्यान में रखा गया है। �
Press Information Bureau
भविष्य के NGO/FPO आधारित projects में स्पष्ट होना चाहिए:
किसान का डेटा किसका है?
कौन उसे देख सकता है?
किस उद्देश्य से उपयोग होगा?
क्या किसान अपनी consent वापस ले सकता है?
18. छत्तीसगढ़ के लिए स्मार्ट कृषि का विशेष महत्व
छत्तीसगढ़ की कृषि परिस्थितियाँ स्मार्ट कृषि के लिए एक विशिष्ट अवसर प्रस्तुत करती हैं।
राज्य में लगभग 4.78 million hectare cultivated area है और प्रमुख फसलें rice, wheat, millets, pulses और oilseeds हैं। �
Indian Council of Agricultural Research
साथ ही राज्य की कृषि जलवायु जोखिमों के प्रति संवेदनशील है। Chhattisgarh Climate Change Centre के अनुसार अनियमित मानसून, सूखा, बाढ़ और बदलते मौसम कृषि उत्पादकता को प्रभावित कर सकते हैं। �
CG Climate Change +1
इसलिए यहाँ Smart Agriculture को केवल "High-Tech Agriculture" नहीं बल्कि:
"Climate-Smart, Smallholder-Friendly and Resource-Efficient Agriculture"
के रूप में विकसित करना अधिक उपयुक्त होगा।
19. छत्तीसगढ़ के लिए संभावित Smart Agriculture Model
स्तर 1 — किसान
Smartphone
Weather advisory
Soil testing
Crop advisory
स्तर 2 — खेत
Soil moisture sensor
Weather station
Smart irrigation
Camera
स्तर 3 — ग्राम
Community weather station
Drone service
Custom Hiring Centre
Digital Agriculture Resource Centre
स्तर 4 — FPO
Drone
Soil testing equipment
Farm machinery
Storage
Digital market information
स्तर 5 — जिला/राज्य
Satellite data
AI analytics
Crop mapping
Weather data
Market data
Government schemes
20. FPO आधारित Smart Agriculture Service Centre
छोटे किसानों के लिए यह मॉडल विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है।
एक FPO/Cooperative आधारित Smart Agriculture Service Centre में निम्न सुविधाएँ हों:
सुविधा
उपयोग
Drone
Crop monitoring/spraying
Soil Testing
Soil health
Weather Station
Local forecast
Moisture Sensors
Irrigation
Farm Machinery
Custom hiring
AI Advisory
Crop decisions
Digital Market
Price information
Storage
Post-harvest management
Training
Digital literacy
किसान individual machine खरीदने के बजाय सेवा के लिए भुगतान कर सकता है।
21. छत्तीसगढ़ के आदिवासी एवं दूरस्थ क्षेत्रों के लिए मॉडल
विशेष रूप से Surguja, Mainpat, Korba, Koriya, Balrampur, Jashpur, Bastar क्षेत्र जैसे विविध agro-ecological क्षेत्रों में technology को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार लागू किया जा सकता है।
यहाँ मॉडल में शामिल हो सकते हैं:
Solar-powered weather station
Mobile-based advisory
Voice messages
Local language content
Community seed bank
Traditional crop documentation
Millets monitoring
NTFP-related climate information
Water harvesting monitoring
Soil moisture monitoring
Community irrigation
22. स्मार्ट कृषि और जलवायु परिवर्तन
Smart Agriculture को Climate-Smart Agriculture से जोड़ना आवश्यक है।
तीन प्रमुख लक्ष्य होने चाहिए:
1. Adaptation
जलवायु जोखिमों से किसान की सुरक्षा।
2. Mitigation
ऊर्जा, पानी और chemical inputs के अनावश्यक उपयोग को कम करना।
3. Productivity
उत्पादन और आय की स्थिरता बढ़ाना।
छत्तीसगढ़ की Climate Resilient Agriculture strategy में भी छोटे किसानों, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, diversified agriculture, farmer-driven technology और स्थानीय ज्ञान पर जोर दिया गया है। �
CG Climate Change
23. स्मार्ट कृषि में सरकारी पहल
भारत में Digital Agriculture Mission ₹2,817 करोड़ के कुल परिव्यय के साथ शुरू किया गया है। इसके प्रमुख घटक हैं:
AgriStack
Farmer Registry
Geo-referenced Village Maps
Crop Sown Registry
Krishi Decision Support System
Soil Profile Mapping
Digital Crop Survey
AI/remote sensing आधारित decision support
�
Press Information Bureau +1
इसके अतिरिक्त सरकार द्वारा micro-irrigation, Kisan Drones, agricultural mechanization और अन्य advanced technologies को विभिन्न योजनाओं के माध्यम से बढ़ावा दिया जा रहा है। �
Indian Council of Agricultural Research
24. छत्तीसगढ़ में संस्थागत अवसर
छत्तीसगढ़ में smart agriculture ecosystem बनाने में निम्न संस्थाएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं:
कृषि विभाग
→ Farmer outreach, schemes और extension
IGKV
→ Research, AI, crop advisory, technology validation
KVKs
→ Demonstration और farmer training
FPOs
→ सामूहिक technology adoption
PACS/Cooperatives
→ ग्रामीण service delivery
Agri-tech startups
→ Sensors, AI, apps, drones
NGOs/CBOs
→ Last-mile adoption और community capacity building
छत्तीसगढ़ में PACS को Common Service Centres तथा कृषि input/service centres से जोड़ने की पहल भी हुई है; राज्य सरकार के अनुसार सभी 2,058 PACS में Pradhan Mantri Kisan Samriddhi Kendras स्थापित किए जा चुके हैं। �
Department of Cooperation
25. स्मार्ट कृषि की प्रमुख चुनौतियाँ और समाधान
चुनौती
संभावित समाधान
महंगे उपकरण
FPO/CHC आधारित सामूहिक उपयोग
छोटे खेत
Pay-per-use technology
डिजिटल अशिक्षा
Village Digital Agriculture Training
इंटरनेट की कमी
Offline/SMS/Voice advisory
बिजली की समस्या
Solar-powered systems
भाषा बाधा
हिंदी/छत्तीसगढ़ी advisory
डेटा सुरक्षा
Consent-based data governance
उपकरण maintenance
Local youth technicians
तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता
Farmer + AI decision model
कमजोर बाजार
Digital market linkage
Post-harvest loss
Storage/cold-chain integration
26. NGO एवं सामुदायिक संगठनों के लिए संभावित परियोजना
"ग्राम स्मार्ट कृषि एवं जलवायु लचीलापन कार्यक्रम"
उद्देश्य
छोटे एवं सीमांत किसानों को कम लागत वाली digital, IoT और climate-smart technologies से जोड़ना।
संभावित क्षेत्र
छत्तीसगढ़ के चयनित ग्रामीण/आदिवासी जिले।
प्रमुख गतिविधियाँ
Baseline survey
Farmer digital literacy
Soil testing
Community weather station
Soil moisture monitoring
Smart irrigation demonstration
AI crop advisory
Drone demonstration
FPO/SHG capacity building
Traditional knowledge documentation
Climate-resilient crop planning
Digital market linkage
27. एक संभावित "Smart Village Agriculture Hub"
प्रत्येक चयनित गांव में एक Smart Agriculture Resource Point बनाया जा सकता है।
इसमें होगा:
Digital Agriculture Display
↓
Weather Information
↓
Soil Testing
↓
Crop Advisory
↓
IoT Demonstration
↓
FPO/CHC Linkage
↓
Market Information
यह केंद्र स्थानीय युवाओं को "Digital Agriculture Mitra" के रूप में प्रशिक्षित कर संचालित किया जा सकता है।
28. Technology Adoption का चरणबद्ध मॉडल
सभी किसानों को एक साथ महंगी technology देने के बजाय:
Phase 1 – Awareness
Smart agriculture क्या है?
Phase 2 – Demonstration
एक-दो खेतों में technology demonstration।
Phase 3 – Community Adoption
FPO/SHG/ग्राम समूह के माध्यम से सामूहिक उपयोग।
Phase 4 – Business Model
Technology-as-a-Service।
Phase 5 – Scale-up
सफल मॉडल को दूसरे गांवों में विस्तार।
29. सफलता के मापदंड
Smart Agriculture project की सफलता केवल "कितने sensors लगाए गए" से नहीं मापी जानी चाहिए।
बल्कि:
प्रति एकड़ पानी की खपत
fertilizer उपयोग
pesticide उपयोग
उत्पादन
उत्पादन लागत
किसान की शुद्ध आय
crop loss
climate-related losses
irrigation efficiency
technology adoption
महिला किसानों की भागीदारी
youth employment
FPO revenue
जैसे indicators से मापी जानी चाहिए।
30. निष्कर्ष
भारत में स्मार्ट कृषि केवल भविष्य की अवधारणा नहीं रह गई है। Digital Agriculture Mission, ICAR research, AI-based advisory, drones, IoT irrigation, remote sensing और digital crop surveys इसके विभिन्न हिस्सों को व्यवहार में ला रहे हैं। �
Press Information Bureau +1
लेकिन भारत और विशेष रूप से छत्तीसगढ़ के लिए स्मार्ट कृषि का सही मॉडल महंगे और अत्यधिक स्वचालित बड़े फार्मों की नकल करना नहीं, बल्कि छोटे और सीमांत किसानों की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप कम लागत, सामुदायिक और स्थानीय भाषा आधारित तकनीकी समाधान विकसित करना है।
छत्तीसगढ़ में लगभग 80% किसानों के छोटे एवं सीमांत होने और कृषि के बड़े हिस्से के वर्षा तथा सीमित सिंचाई संसाधनों पर निर्भर होने के कारण IoT आधारित सिंचाई, स्थानीय मौसम स्टेशन, AI advisory, soil monitoring, climate-resilient crops और FPO/CHC आधारित shared technology विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकते हैं। �
Natural Farming +1
इसलिए छत्तीसगढ़ के लिए स्मार्ट कृषि का प्रस्तावित दृष्टिकोण होना चाहिए:
"स्मार्ट तकनीक, स्थानीय ज्ञान और सामुदायिक संस्थाओं के माध्यम से छोटे किसानों के लिए जलवायु-सक्षम, संसाधन-कुशल और लाभकारी कृषि।"
या अंग्रेजी में:
“Smart Technology + Local Knowledge + Community Institutions = Climate-Resilient and Sustainable Agriculture.”

Thursday, 17 September 2026

Community Dialogue on Livelihoods and Farming in Pampapur, Surguja

Community Dialogue on Livelihoods and Farming in Pampapur, Surguja
A community meeting was held with the male and female members of Gram Adhikar Manch in Pampapur village, Ambikapur Development Block, Surguja district, Chhattisgarh.
The meeting brought together community members to reflect on their ongoing livelihood initiatives, farming practices, challenges and opportunities for strengthening rural livelihoods.
Key Discussions
The interaction focused on understanding the livelihood-related activities being undertaken by community members and the practical realities they face in their day-to-day lives.
Participants discussed:
Current livelihood and farming initiatives being undertaken by families.
Practical challenges affecting agricultural activities and farm-based livelihoods.
Issues related to improving productivity, resources and sustainability.
Possible locally appropriate solutions based on community experience and available resources.
The importance of collective action and community participation in addressing livelihood challenges.
The discussions also provided an opportunity to listen to the experiences and perspectives of both women and men, recognising their respective roles in agriculture, household livelihoods and community development.
Participants
The meeting was attended by Mr. Sanjay Sharma, CEO, Anmol Foundation and Founder, Gram Adhikar Manch, along with Mr. Rakesh Rai and members of the Gram Adhikar Manch.
Way Forward
It was collectively agreed that the discussions would be taken forward through a subsequent meeting. A community-oriented action plan will be developed based on the issues identified, local priorities and feasible solutions.
The proposed approach is to build on local knowledge, community participation and available resources, while identifying practical steps for strengthening livelihoods and improving farming practices.
Community-Led Development
Such grassroots dialogues are important because sustainable rural development begins with listening to communities, understanding their lived realities and working together to identify practical solutions.
Gram Adhikar Manch continues to provide a platform where rural communities can come together, share their experiences and collectively discuss issues affecting their livelihoods and rights.
From dialogue to collective action — strengthening rural livelihoods through community leadership.

Wednesday, 2 September 2026

Empowering TB Champions Through Access to Government Welfare Schemes A meaningful two-day State-Level Review Meeting of TB Champions – Chhattisgarh

Empowering TB Champions Through Access to Government Welfare Schemes
A meaningful two-day State-Level Review Meeting of TB Champions – Chhattisgarh was organized by REACH Chennai – Chhattisgarh Unit on 31 August and 1 September 2026 at Hotel Aditya, Raipur.
I was privileged to be invited as a Resource Person on behalf of Anmol Foundation to facilitate a session on Government Welfare Schemes and Social Protection Services available to TB Champions, TB-affected individuals and their families.
The session went beyond simply introducing government schemes. It focused on how people can actually access these services—understanding eligibility, application procedures, required documents and the appropriate government department or institution to approach.
The discussion covered schemes and services of several departments, including Health, Agriculture, Panchayat & Rural Development, Legal Services, Police, Women & Child Development, Horticulture, Fisheries, Social Welfare, Forest & Climate Change, Sericulture, Animal Husbandry, Labour, Food, Education, Solar Energy and Electricity.
An interactive discussion with TB Champions helped identify practical challenges faced by communities while accessing government support. Their questions were addressed with a focus on developing their capacity to guide, facilitate and connect vulnerable families with appropriate welfare services.
From Awareness to Access
For TB-affected families, recovery is not only about medical treatment. Nutrition, livelihood, social security, legal support, housing, employment and access to government entitlements are equally important for achieving sustainable recovery and dignity.
Empowered and well-informed TB Champions can become an important bridge between communities and government welfare systems.
I am grateful to REACH Chennai – Chhattisgarh Unit for providing me the opportunity to contribute to this important capacity-building initiative.
Together, let us strengthen community leadership and ensure that every eligible person can access the support and entitlements they deserve.
#TBChampions #TBFreeIndia #TBMuktBharat #REACHChennai #Chhattisgarh #AnmolFoundation #SocialProtection #GovernmentSchemes #CommunityHealth #HealthEquity #TBElimination #CapacityBuilding #CommunityLeadership #PublicHealth #SocialJustice

कमरछठ या हलछठ के व्रत में पसहर और तिन्नी चावल की परंपरा

कमरछठ या हलछठ के व्रत में पसहर और तिन्नी चावल की परंपरा
लोक आस्था, पारंपरिक कृषि और जैव विविधता से जुड़ा एक अनमोल खाद्य विरासत

भारत की लोक परंपराओं में अनेक ऐसे पर्व और व्रत हैं, जिनमें केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि हमारी कृषि संस्कृति, प्रकृति के प्रति सम्मान और पारंपरिक खाद्य प्रणालियों की गहरी समझ भी दिखाई देती है। ऐसा ही एक पर्व है कमरछठ या हलषष्ठी, जिसे विशेष रूप से माताएं अपनी संतान की सुख-समृद्धि, दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की कामना के लिए करती हैं।
हलषष्ठी का संबंध कृषि और खेतिहर जीवन से भी माना जाता है। इस दिन हल से जुड़ी कृषि उपज तथा सामान्य अनाजों के बजाय कुछ ऐसे पारंपरिक खाद्य पदार्थों का उपयोग किया जाता है, जो स्थानीय कृषि एवं प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े हुए हैं। इनमें पसहर चावल और तिन्नी का चावल विशेष महत्व रखते हैं।
पसहर चावल क्या है?
पसहर चावल को अलग-अलग क्षेत्रों में पसई, पसाढ़ी या पसहर चावल जैसे स्थानीय नामों से जाना जाता है। यह पारंपरिक धान की उस खाद्य परंपरा का हिस्सा है, जिसे ग्रामीण समाज ने पीढ़ियों से संरक्षित किया है।
पसहर चावल की विशेषता केवल इसका स्वाद नहीं है। इसके पीछे पारंपरिक कृषि ज्ञान, स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल धान की किस्मों का संरक्षण और मौसम के अनुसार भोजन की व्यवस्था जैसी कई बातें जुड़ी हुई हैं।
कई ग्रामीण क्षेत्रों में इस चावल को विशेष अवसरों और व्रत-त्योहारों से जोड़कर देखा जाता है। कमरछठ/हलषष्ठी के अवसर पर इसका उपयोग इस बात का उदाहरण है कि किस तरह हमारे त्योहारों ने पारंपरिक खाद्य पदार्थों और स्थानीय जैव विविधता को बचाए रखने में भूमिका निभाई।
तिन्नी का चावल – खेत से अलग एक पारंपरिक खाद्य संसार
तिन्नी का चावल भी कमरछठ/हलषष्ठी की खाद्य परंपरा में महत्वपूर्ण माना जाता है। तिन्नी सामान्य धान की खेती से अलग प्राकृतिक या अर्ध-प्राकृतिक परिस्थितियों में मिलने वाला पारंपरिक अनाज है। विभिन्न क्षेत्रों में तिन्नी के स्थानीय नाम और इसकी पहचान अलग-अलग हो सकती है।
ग्रामीण समाज में ऐसे खाद्य पदार्थों का महत्व इसलिए भी रहा है क्योंकि ये केवल बाजार पर निर्भर खाद्य नहीं थे। स्थानीय समुदाय अपने आसपास उपलब्ध धान, जंगली खाद्य वनस्पतियों, छोटे अनाजों और मौसमी खाद्य संसाधनों को पहचानता और उनका उपयोग करता था।
आज जब खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता की चर्चा वैश्विक स्तर पर हो रही है, तब तिन्नी जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थों की परंपरा हमें यह समझने का अवसर देती है कि हमारे पूर्वजों की खाद्य व्यवस्था कितनी विविध और प्रकृति-आधारित थी।
व्रत में इन चावलों का विशेष महत्व क्यों?
हलषष्ठी की परंपरा में भोजन से जुड़े कई नियम हैं। इन नियमों का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व तो है ही, लेकिन इनके पीछे ग्रामीण जीवन और कृषि व्यवस्था की झलक भी दिखाई देती है।
इस अवसर पर उपयोग किए जाने वाले पारंपरिक अनाज यह संदेश देते हैं कि भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और प्रकृति से जुड़ा माध्यम भी है।
पसहर और तिन्नी जैसे चावलों का उपयोग हमें उस समय की याद दिलाता है जब गांवों में भोजन का आधार स्थानीय उत्पादन और प्राकृतिक संसाधन हुआ करते थे। उस दौर में हर खाद्य पदार्थ का अपना मौसम, अपना क्षेत्र और अपनी सांस्कृतिक भूमिका होती थी।
कमरछठ और पारंपरिक कृषि का संबंध
हलषष्ठी को कई स्थानों पर हलछठ भी कहा जाता है। 'हल' शब्द स्वयं कृषि और खेती की ओर संकेत करता है। भारतीय ग्रामीण समाज में हल केवल खेती का औजार नहीं रहा, बल्कि वह किसान के जीवन, आजीविका और सामाजिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण प्रतीक रहा है।
इस पर्व की खाद्य परंपराओं में भी कृषि संस्कृति की छाप दिखाई देती है।
पसहर और तिन्नी जैसे पारंपरिक चावल हमें बताते हैं कि हमारी कृषि परंपरा कभी केवल कुछ प्रमुख फसलों तक सीमित नहीं थी। ग्रामीण भारत में अनेक स्थानीय धान किस्में और अन्य खाद्य वनस्पतियां थीं, जिनका उपयोग अलग-अलग मौसम, अवसर और सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार किया जाता था।
पारंपरिक चावल और जैव विविधता
आज भारत में धान की अनेक पारंपरिक किस्में तेजी से कम होती जा रही हैं। अधिक उत्पादन देने वाली सीमित किस्मों के विस्तार के कारण कई स्थानीय किस्में किसानों के खेतों से बाहर हो रही हैं।
पसहर और तिन्नी जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थों का उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इनके साथ बीज विविधता और स्थानीय खाद्य संस्कृति भी जुड़ी हुई है।
एक पारंपरिक चावल की किस्म का संरक्षण केवल एक अनाज को बचाना नहीं है। इसके साथ किसान का ज्ञान, खेती की तकनीक, स्थानीय जलवायु की समझ, भोजन बनाने की विधि और उससे जुड़ी लोक परंपराएं भी संरक्षित होती हैं।
इसीलिए पारंपरिक खाद्य पदार्थों को आज Agrobiodiversity यानी कृषि जैव विविधता के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखने की आवश्यकता है।
व्रत से संरक्षण तक
लोक पर्वों की एक बड़ी खूबी यह रही है कि उन्होंने ऐसी परंपराओं को जीवित रखा जिन्हें केवल आर्थिक दृष्टि से देखना कठिन था।
किसी खास पर्व पर किसी स्थानीय चावल की आवश्यकता होने का अर्थ है कि परिवार उस चावल को संभालकर रखेगा, किसान उसकी खेती करेगा और अगली पीढ़ी भी उसके बारे में जानेगी।
इस तरह एक धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा अनजाने में ही पारंपरिक बीज संरक्षण की व्यवस्था बन सकती है।
आज आवश्यकता है कि इन परंपराओं को केवल धार्मिक अनुष्ठान के रूप में न देखकर इनके पीछे छिपे पारंपरिक ज्ञान और खाद्य जैव विविधता को भी समझा जाए।
नई पीढ़ी के लिए एक संदेश
आज की पीढ़ी के लिए पसहर और तिन्नी का चावल केवल व्रत में खाया जाने वाला भोजन नहीं है। यह हमारी ग्रामीण सभ्यता की एक कहानी है।
यह कहानी बताती है कि हमारे पूर्वज अपने आसपास की प्रकृति को पहचानते थे, स्थानीय खाद्य संसाधनों का उपयोग करते थे और मौसम तथा कृषि चक्र के अनुरूप अपनी भोजन व्यवस्था विकसित करते थे।
जरूरत है कि गांवों में उपलब्ध ऐसे पारंपरिक चावलों की पहचान, दस्तावेजीकरण, बीज संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए। किसानों और ग्रामीण महिलाओं के पास मौजूद पारंपरिक ज्ञान को दर्ज किया जाए और स्थानीय समुदायों को इसके संरक्षण में सहभागी बनाया जाए।
निष्कर्ष
कमरछठ या हलषष्ठी के अवसर पर पसहर और तिन्नी के चावल का उपयोग हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है। यह परंपरा आस्था के साथ-साथ कृषि, प्रकृति, जैव विविधता और स्थानीय खाद्य संस्कृति का भी प्रतीक है।
आज जब पूरी दुनिया पारंपरिक खाद्य प्रणालियों, स्थानीय बीजों और जैव विविधता के संरक्षण की आवश्यकता महसूस कर रही है, तब हमारे लोक पर्वों में संरक्षित यह ज्ञान और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
पसहर और तिन्नी के चावल को बचाना केवल एक पारंपरिक भोजन को बचाना नहीं है; यह हमारे खेत, हमारे बीज, हमारे किसान, हमारी लोक-स्मृति और हमारी खाद्य संस्कृति को बचाने का प्रयास है।
“लोक परंपराओं में छिपे बीजों को बचाइए,
बीज बचेंगे तो हमारी खाद्य संस्कृति और जैव विविधता भी बचेगी।”

Sunday, 16 August 2026

‘अदहन’: पूर्वांचल की रसोई में बसा एक पारंपरिक शब्द

‘अदहन’: पूर्वांचल की रसोई में बसा एक पारंपरिक शब्द
“दाल के लिए अदहन चढ़ा दो।”
पूर्वांचल के गांवों में कभी यह वाक्य घर की रसोई में बहुत सहजता से सुनाई देता था। आज भी उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के कई ग्रामीण इलाकों में ‘अदहन’ शब्द पारंपरिक भोजन, घरेलू जीवन और स्थानीय बोली की एक जीवंत पहचान के रूप में सुनने को मिलता है।
‘अदहन’ सामान्यतः उस पानी को कहा जाता है जिसे दाल पकाने से पहले चूल्हे पर गरम करने के लिए चढ़ाया जाता है। मिट्टी के चूल्हे पर लकड़ी, उपले या कृषि-अवशेषों की आग जलती थी और उसके ऊपर पानी से भरी हांडी या पतीली रख दी जाती थी। पानी गर्म होने के बाद उसमें दाल डालकर पकाई जाती थी।
अदहन केवल पानी नहीं, एक परंपरा है
आधुनिक रसोई में गैस चूल्हे, प्रेशर कुकर और इंडक्शन ने भोजन पकाने की प्रक्रिया को काफी बदल दिया है। लेकिन पहले ग्रामीण परिवारों में दाल पकाना भी एक पारंपरिक प्रक्रिया हुआ करती थी।
सुबह या दोपहर के भोजन की तैयारी शुरू होती तो सबसे पहले चूल्हा जलाया जाता। घर की महिलाएं अनाज और दाल की तैयारी करतीं और साथ ही कहा जाता—
“अदहन चढ़ गया क्या?”
इस छोटे-से वाक्य में भोजन पकाने की पूरी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण छिपा होता था।
मिट्टी के चूल्हे से जुड़ी यादें
अदहन का संबंध केवल दाल से नहीं था, बल्कि वह उस समय की पूरी ग्रामीण रसोई का हिस्सा था। मिट्टी के चूल्हे, लकड़ी या उपले की आग, पीतल या पीतल-मिश्रित बर्तनों, लोहे की कड़ाही और मिट्टी की हांडी—इन सबके बीच ‘अदहन’ शब्द का अपना स्थान था।
दाल के लिए पानी गर्म होने में समय लगता था। इस दौरान घर के दूसरे काम भी चलते रहते थे। भोजन बनाना केवल एक घरेलू काम नहीं था, बल्कि परिवार और पड़ोस के सामाजिक जीवन का भी हिस्सा था।
स्थानीय भाषा में छिपी संस्कृति
‘अदहन’ जैसे शब्द यह बताते हैं कि भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति का दस्तावेज भी है।
किसी क्षेत्र की बोली में ऐसे अनेक शब्द मिलते हैं जिनका सीधा संबंध वहां के भोजन, खेती, पशुपालन, मौसम, कृषि उपकरणों और पारंपरिक जीवन से होता है।
पूर्वांचल की बोलियों—जैसे भोजपुरी, अवधी और इनके स्थानीय रूपों—में ऐसे अनेक शब्द आज भी बुजुर्ग पीढ़ी की बातचीत में सुनाई देते हैं। इनमें से कई शब्द धीरे-धीरे दैनिक जीवन से बाहर हो रहे हैं क्योंकि उनके पीछे की जीवन-शैली भी बदल रही है।
‘अदहन’ और बदलता ग्रामीण जीवन
आज दाल बनाने में प्रेशर कुकर का प्रयोग सामान्य हो गया है। पानी अलग से चूल्हे पर गर्म करने की आवश्यकता कम हो गई है। गैस और इंडक्शन ने खाना पकाने की प्रक्रिया को तेज और सुविधाजनक बना दिया है।
इसके साथ ही पारंपरिक शब्दावली भी धीरे-धीरे कम होती जा रही है।
नई पीढ़ी के कई बच्चों को शायद यह पता भी न हो कि ‘अदहन चढ़ाना’ क्या होता है। यही कारण है कि ऐसे स्थानीय शब्दों को केवल शब्दकोश में दर्ज करना पर्याप्त नहीं है; उनके साथ जुड़ी कहानियों, स्मृतियों और जीवन-पद्धति को भी दर्ज किया जाना चाहिए।
एक शब्द, एक पूरा लोक-संसार
‘अदहन’ शब्द सुनते ही एक पूरा दृश्य आंखों के सामने उभर सकता है—गांव का घर, आंगन, मिट्टी का चूल्हा, जलती हुई लकड़ियां, ऊपर रखी पतीली, धीरे-धीरे गर्म होता पानी और पास में दाल साफ करती हुई घर की महिलाएं।
यही लोक-स्मृतियां हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं।
आज जब हम पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय खाद्य संस्कृति और ग्रामीण जीवन-पद्धति को संरक्षित करने की बात करते हैं, तब ‘अदहन’ जैसे छोटे-छोटे शब्द भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। ये शब्द हमें बताते हैं कि हमारे पूर्वज भोजन कैसे बनाते थे, किस तरह समय का उपयोग करते थे और किस प्रकार रोजमर्रा के कामों में प्रकृति और स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते थे।
शब्दों को बचाना, संस्कृति को बचाना
स्थानीय बोलियों के शब्द तेजी से बदल रहे हैं। कई शब्द केवल बुजुर्गों की स्मृति तक सीमित होते जा रहे हैं। इसलिए जरूरत है कि गांवों में प्रचलित ऐसे शब्दों का लोक-शब्दकोश तैयार किया जाए।
बुजुर्गों से बातचीत करके यह दर्ज किया जा सकता है कि किसी शब्द का क्या अर्थ था, उसका प्रयोग किस संदर्भ में होता था और उससे जुड़ी कौन-सी परंपरा या जीवन-पद्धति थी।
‘अदहन’ इसी तरह का एक छोटा-सा शब्द है, लेकिन इसके भीतर पूर्वांचल की ग्रामीण रसोई, पारंपरिक भोजन और लोक-संस्कृति की एक बड़ी कहानी छिपी है।
निष्कर्ष
समय बदलता है, तकनीक बदलती है और जीवन जीने के तरीके भी बदलते हैं। लेकिन हमारी लोकभाषा में दर्ज शब्द हमारी सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखते हैं।
‘अदहन’ केवल दाल पकाने के लिए चूल्हे पर चढ़ाया गया पानी नहीं है; यह पूर्वांचल की एक ऐसी लोक-स्मृति है जिसमें मिट्टी का चूल्हा, पारंपरिक भोजन, परिवार, श्रम और गांव का जीवन एक साथ दिखाई देता है।
इसलिए ऐसे शब्दों को याद करना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना हमारी लोक-संस्कृति को बचाए रखने की दिशा में एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कदम है।

यूथ चैंपियन–स्वराज संवाद

दिनांक: 22 सितंबर 2026 | माध्यम: ऑनलाइन प्रतिभागिता: 6 जिलों से 10 युवा बैठक का उद्देश्य “स्वराज के विचारों को कैसे मजबूत करें औ...