Friday, 17 July 2026

प्रजातंत्र बनाम राजतंत्र: आखिर जनता किसका दरवाज़ा खटखटाए — संजय शर्मा

प्रजातंत्र बनाम राजतंत्र: आखिर जनता किसका दरवाज़ा खटखटाए?
— संजय शर्मा
राजतंत्र और प्रजातंत्र के बीच सबसे बड़ा अंतर यही माना जाता है कि राजतंत्र में सत्ता कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित होती है, जबकि प्रजातंत्र में अंतिम शक्ति जनता के पास होती है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या व्यवहार में हम वास्तव में प्रजातंत्र का अनुभव कर रहे हैं, या केवल उसके स्वरूप में जी रहे हैं?
आज समाज का एक बड़ा वर्ग ऐसा महसूस करता है कि उसकी भूमिका केवल कमाने, कर चुकाने और व्यवस्था को चलाने तक सीमित रह गई है। अधिकारों की बात तो होती है, लेकिन निर्णय प्रक्रिया में उसकी वास्तविक भागीदारी बहुत कम दिखाई देती है।
अक्सर "सामान्य वर्ग" के नाम पर बहुत चर्चा होती है। लेकिन यह भी एक विचारणीय प्रश्न है कि यह वर्ग वास्तव में किसका प्रतिनिधित्व करता है? यदि यह सभी के लिए खुला वर्ग है, तो फिर उन लोगों की पहचान और हितों का प्रतिनिधित्व कौन करेगा जो स्वयं को इसी वर्ग का हिस्सा मानते हैं? यह प्रश्न किसी के अधिकारों का विरोध नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व और समान अवसर की बहस है।
स्वतंत्रता के बाद भारत ने राजतंत्र को छोड़कर प्रजातंत्र को अपनाया। उद्देश्य स्पष्ट था—हर नागरिक को समान सम्मान मिले, उसकी आवाज़ सुनी जाए और अन्याय होने पर उसे न्याय पाने का अवसर मिले। इसी सोच के साथ संविधान बना, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना हुई और सत्ता के विभिन्न अंगों के बीच संतुलन की व्यवस्था बनाई गई।
जनप्रतिनिधियों के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून बनाया गया। प्रशासनिक व्यवस्था को जवाबदेह बनाने के लिए सेवा नियम और कानूनी प्रावधान बनाए गए। न्यायपालिका भी संवैधानिक मर्यादाओं और उत्तरदायित्वों के दायरे में कार्य करती है।
लेकिन एक लोकतांत्रिक प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है—यदि लोकतंत्र के सभी प्रमुख स्तंभ, अर्थात जनप्रतिनिधि, नौकरशाही और अन्य संवैधानिक संस्थाएँ, एक ही दिशा में खड़ी दिखाई दें और आम नागरिक स्वयं को असहाय महसूस करे, तो वह अपनी आवाज़ किस मंच पर उठाए? लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि नागरिकों को अपनी बात रखने और जवाबदेही मांगने का अवसर मिलता रहे। इसलिए संस्थाओं का स्वतंत्र और उत्तरदायी बने रहना लोकतंत्र की मूल आवश्यकता है।
आज के समय में प्रश्न बहुत हैं। संभव है कि आने वाली पीढ़ी—विशेषकर जेनरेशन Z और उसके बाद की पीढ़ियाँ—इन प्रश्नों के उत्तर अधिक मुखर होकर मांगें। वे अपनी भाषा, अपने माध्यम और अपने तरीकों से जवाबदेही की अपेक्षा करेंगी। तब इतिहास यह भी पूछेगा कि हमने उनके लिए कैसी व्यवस्था छोड़ी थी।
हमने अपनी आने वाली पीढ़ियों के सामने अनेक चुनौतियाँ छोड़ दी हैं—
धर्म के आधार पर विभाजन।
सामाजिक और प्रशासनिक वर्गों के आधार पर विभाजन।
जातिगत ऊँच-नीच की पुरानी विरासत, जिसका समाधान आज भी अधूरा है।
शिक्षा में असमानता—उच्च संस्थानों और सामान्य शैक्षणिक संस्थानों के बीच बढ़ती दूरी।
आर्थिक असमानता—बड़े उद्योगपतियों, व्यापारियों और सामान्य नागरिकों के बीच बढ़ती खाई।
प्रशासनिक पदों और आम कर्मचारियों के बीच बढ़ती सामाजिक दूरी।
पद, पैसा और शक्ति के आधार पर व्यक्ति का मूल्यांकन।
और अंततः ईमानदारी तथा बेईमानी के बीच धुंधली होती रेखाएँ।
इन प्रश्नों पर गंभीर संवाद होना चाहिए। लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं है; यह समान अवसर, जवाबदेही, न्याय और नागरिक सम्मान की सतत प्रक्रिया है। यदि समाज में संवाद समाप्त हो जाएगा, तो असंतोष बढ़ेगा। यदि संवाद जीवित रहेगा, तो समाधान भी निकलेंगे।
आज आवश्यकता किसी नए विभाजन की नहीं, बल्कि ऐसे लोकतंत्र को मजबूत करने की है जिसमें प्रत्येक नागरिक स्वयं को सम्मानित, सुरक्षित और सहभागी महसूस करे। यही लोकतंत्र की वास्तविक आत्मा है, और यही हमारी आने वाली पीढ़ियों के प्रति सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी।
— संजय शर्मा

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