Thursday, 28 May 2026

निरंजन राय जी की स्मृतियों में बसता गांव

निरंजन राय जी की स्मृतियों में बसता गांव
समाज के सम्मानित वरिष्ठजन निरंजन राय जब अपने बचपन के दिनों को याद करते हैं, तो उनके शब्द केवल यादें नहीं लगते, बल्कि एक पूरे दौर की जीवंत तस्वीर बन जाते हैं।
वह दौर, जब गांव केवल रहने की जगह नहीं था — वह आत्मनिर्भरता, अपनापन और प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली का प्रतीक था।
निरंजन राय जी बताते हैं कि यह बात 1960 के शुरुआती दशक की है। उस समय खेती केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि परिवार और समाज की सामूहिक जीवन पद्धति थी। खेतों में हलवाहे बैलों से हल चलाते थे और घर से उनके लिए खाना लेकर जाना बच्चों की जिम्मेदारी और गर्व दोनों होता था। उस छोटे से काम में भी अपनापन और सम्मान छिपा रहता था। खेत, किसान, बैल और परिवार — सब एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए थे।
गेहूं की फसल कटने के बाद “दवांरी” का समय आता था। बैलों द्वारा फसल मड़ाई की जाती थी। खेतों में धूल उड़ती थी, बैलों की घंटियों की आवाज गूंजती थी और पूरा वातावरण श्रम और उत्सव का अद्भुत संगम बन जाता था। उस समय मशीनें नहीं थीं, लेकिन लोगों के चेहरों पर थकान कम और संतोष अधिक दिखाई देता था।
गर्मी के दिनों की यादें तो आज भी उनके मन को सबसे अधिक भावुक कर देती हैं। गांव के बगीचों में दोस्तों और भाइयों के साथ आम तोड़ने जाना किसी त्योहार से कम नहीं होता था। बच्चे पेड़ों की डालियों को जोर-जोर से हिलाते थे और पके हुए आम जमीन पर टप-टप गिरते थे। फिर सब मिलकर उन्हें बीनते, बाल्टी भरते और वहीं बैठकर रस से भरे आम चूस-चूसकर खाते थे।
निरंजन राय जी मुस्कुराते हुए कहते हैं —
“उस समय कोई गिनती नहीं होती थी कि कितने आम खाए। घर का बगीचा था, जितना मन करे उतना खाओ। वह स्वाद किसी अमृत से कम नहीं था।”
आज जब शहरों में आम खरीदकर खाने पड़ते हैं, तो पहले जेब देखनी पड़ती है, फिर आम। स्वाद शायद आज भी वही हो, लेकिन वह अपनापन, वह बेफिक्री और वह सामूहिक आनंद अब कहीं खो गया है।
उनकी स्मृतियों में एक और छोटी-सी लेकिन बेहद खास खुशी बसती है — साइकिल चलाने की।
जिस दिन बाबू जी स्कूल नहीं जाते थे और साइकिल घर पर रहती थी, उस दिन साइकिल चलाने का अवसर मिल जाता था। उस समय वह आनंद ऐसा लगता था मानो कोई हवाई जहाज उड़ा रहा हो। छोटी-छोटी खुशियां ही उस दौर की सबसे बड़ी दौलत थीं।
निरंजन राय जी कहते हैं कि गांव छोड़े हुए लगभग 60 वर्ष हो चुके हैं। आजीविका की तलाश उन्हें शहर ले आई, जीवन बदल गया, समय बदल गया, लेकिन गांव की वे तस्वीरें आज भी उनकी आंखों में वैसी ही ताजा हैं।
वह आज भी साल में कभी-कभी गांव जाते हैं, लेकिन अब उन्हें वह पुराना गांव दिखाई नहीं देता।
न वे पुराने बगीचे रहे,
न वैसी चौपालें,
न वैसा सामूहिक जीवन,
और न ही वह सहज मानवीय अपनापन।
आधुनिकता और विकास की दौड़ ने सुविधाएं तो दीं, लेकिन गांवों की आत्मा कहीं पीछे छूटती चली गई।
यह केवल निरंजन राय जी की कहानी नहीं है।
यह उस पूरी पीढ़ी की कहानी है जिसने मिट्टी से उठकर शहरों तक का सफर तय किया, लेकिन अपने भीतर आज भी गांव की खुशबू, बैलों की घंटियां, आम के बगीचे और बचपन की मासूम खुशियों को संजोए रखा है।

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