Thursday, 28 May 2026

बाजार पर बढ़ती निर्भरता — खोती परम्पराएँ और बिखरता ज्ञान

बाजार पर बढ़ती निर्भरता — खोती परम्पराएँ और बिखरता ज्ञान
हम धीरे-धीरे केवल अपनी परम्पराएँ ही नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों का वह तकनीकी ज्ञान भी भूलते जा रहे हैं जिसने सदियों तक भारतीय समाज को आत्मनिर्भर बनाए रखा।
सच तो यह है कि आधुनिकता और बाजारवाद की दौड़ में हम अपनी जड़ों से लगभग कट चुके हैं।
एक समय था जब गांवों और घरों में उपयोग होने वाली अधिकांश वस्तुएँ लोग स्वयं बना लेते थे। हमारे पूर्वज केवल किसान नहीं थे, वे कुशल कारीगर, तकनीकी जानकार और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीवन जीने वाले लोग थे।
घर में उपयोग होने वाले लगभग 90 प्रतिशत सामान स्थानीय संसाधनों और घरेलू कौशल से तैयार हो जाते थे।
खटिया, मचिया, लकड़ी के उपकरण, खेती के औजार — सब गांवों में ही बन जाते थे। लोग स्वयं इन्हें बनाने में दक्ष होते थे। हर गांव में ऐसे कारीगर होते थे जिनके हाथों में कला और अनुभव बसता था।
कुश से कुरुई बनाना, गेहूं के डंठल से हाथ का पंखा तैयार करना, पुराने कपड़ों से गोदड़ी बनाना — ये केवल घरेलू काम नहीं थे, बल्कि एक जीवंत तकनीकी और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा थे।
बैठक के लिए मड़ई बनाना भी सामूहिक सहयोग का उदाहरण था। गांव के लोग मिलकर लकड़ी, घास और मिट्टी से सुंदर और उपयोगी संरचनाएँ तैयार कर लेते थे। इसमें न किसी बड़े खर्च की आवश्यकता होती थी और न ही बाजार पर निर्भरता की।
यह केवल वस्तुएँ बनाने का ज्ञान नहीं था, बल्कि आत्मनिर्भर जीवन जीने की कला थी।
खाद्य पदार्थों के संरक्षण और प्रसंस्करण में भी हमारे पूर्वज अत्यंत कुशल थे। कृषि उत्पादों से घर में ही अनेक उपयोगी चीजें तैयार हो जाती थीं।
अचार, बड़ी, तिलोड़ी, पापड़, गुड़, राब (तरल गुड़), सत्तू और कई प्रकार के पारंपरिक खाद्य पदार्थ घरों में ही बनाए और सुरक्षित रखे जाते थे। यह केवल भोजन नहीं था, बल्कि स्वास्थ्य, बचत और आत्मनिर्भरता का हिस्सा था।
लेकिन समय के साथ यह पूरी व्यवस्था बदलने लगी।
आधुनिकता, बाजार और उपभोक्तावाद के बढ़ते प्रभाव ने लोगों को धीरे-धीरे बाजार पर निर्भर बना दिया।
जो चीजें कभी घर में बन जाती थीं, वे अब दुकानों से खरीदी जाने लगीं।
नई पीढ़ी ने इन पारंपरिक कौशलों को सीखना बंद कर दिया।
अब बहुत से बच्चों को यह भी पता नहीं कि खटिया कैसे बनाई जाती है, गोदड़ी कैसे तैयार होती है या राब कैसे बनती है।
जो जातिगत कारीगर पीढ़ियों से इन कलाओं और तकनीकों को जीवित रखे हुए थे, उनका काम भी धीरे-धीरे समाप्त होने लगा।
क्योंकि जब लोग बाजार से तैयार सामान खरीदने लगे, तो स्थानीय कारीगरों की आवश्यकता कम होती चली गई।
परिणाम यह हुआ कि केवल रोजगार ही नहीं खत्म हुआ, बल्कि सदियों का अनुभव, तकनीकी ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत भी कमजोर पड़ गई।
हम यह मानने लगे कि तकनीक केवल आधुनिक मशीनों और फैक्ट्रियों में होती है, जबकि सच यह है कि हमारे गांवों में भी अद्भुत तकनीकी समझ मौजूद थी।
वह तकनीक प्रकृति के अनुकूल थी, कम खर्चीली थी और समाज को आत्मनिर्भर बनाती थी।
आज स्थिति यह है कि हम छोटी-छोटी आवश्यकताओं के लिए भी बाजार पर निर्भर हो गए हैं।
हमारे घरों में सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन कौशल कम हुए हैं।
सामान बढ़े हैं, लेकिन आत्मनिर्भरता घट गई है।
यह केवल परम्पराओं के खोने की कहानी नहीं है।
यह उस समाज की कहानी है जो निर्माता से उपभोक्ता बनता जा रहा है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने पूर्वजों के ज्ञान को केवल “पुरानी बातें” समझकर न छोड़ दें।
उनमें आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय रोजगार और सामुदायिक सहयोग की गहरी समझ छिपी हुई थी।
यदि हम आधुनिक शिक्षा के साथ पारंपरिक कौशल और स्थानीय तकनीकी ज्ञान को भी बचा लें, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल बाजार पर निर्भर उपभोक्ता नहीं रहेंगी, बल्कि सृजनकर्ता और आत्मनिर्भर नागरिक बन सकेंगी।
— संजय शर्मा

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