Friday, 8 November 2013

A mass voice raises against acquisition land


In August 2012, during the time of Massive flood in Mahanadi River and that was affecting large part of village which situated side basin of river. The water level majored by Garside Officer and that was found 201.00 meter. Nearly 250-300 hectares agriculture destroys as well as 10000 population livelihoods got affected due to drastic happen occurred in river. Agriculture and vegetable cultivation is mainly livelihood of villagers, all they cultivate vegetable on basin of Mahanadi

C.G Water- Resource Govt. department has been engaging with NCC construction company Ltd Hydrabad for construction of 10 different Power on Mahanadi for that 7 Barrage  would be decide to built. Level of water would be never fall down. Hence 10000 population source of income would be draw to a close.  A number of families were evacuated from their hearth and homes without compensation.  Than Organization take initiative and dialogues with respective departments continuously in between organized and facilitate affected people frequently. One day power of unity shown on 30th 

November 2012, when people was come together to elevate their voice against company exploitation in front of Davra collector. In leadership of Srijan kandra, local LSM network and POs with number of thousand women & men, all they were actively participated and confide their dreadful condition and admired to come from this panic situation.
tation & Resettlement those lands come under this project.

As per Land acquisition they want right compensation.
Proper Rehabilitation & Resettlement those lands come under this project.
Alternative occupational supports for their livelihood.

Got their identity and own land & resources with Human dignity


The Rampur Futamuda village, District Dhamtari, people are living in this village since 1976. Few villagers were cutting down trees of the forest so the people of neighboring village lodged complaint to the officer-in-charge of forest department. So the forest department harassed the villagers who used to cut down the trees. So the harassed villagers left the village. In 1995-96 forest department officer did case on Rampur Futamuda village people for land registration (patta), that’s why Devsingh( head of the village)  and 15 to 20 other people went to jail and a women (Nagina ) lived in jail up to  3 years  and both came out of  jail  in 2004. They got harassed and beaten up in jail. In 2007, those 15-20 villagers came out of jail. But they again got harassed in June 2012 by the forest officer and the forest department had set their shelter on fire. Their livelihood was dependent on agriculture, bamboo making and selling of wood. But due to the action of forest department they had to face lot of hardship. They don’t have identity proof as they are not having voter Identity card
Due to the combining effort and support of Rachna Manch and Lok Swabhagi Manch    their complaint was lodged before the collector of Dhamtari. Then survey was conducted and came up with an effective solution. At Present the villagers got land and got their names listed in voter list. Finally they got their own identification. They have also constructed their house on the land given by the collector

Monday, 4 November 2013

जेंडर जस्टिस – अध्ययन में ८०% किशोरियों ने किया स्वीकार ,आपदा के बाद आश्रय छिनने से बढ़ जाते है किशोरियों के लिए खतरे



आपदा , यु तो सभी के लिए मुसीबत बनाकर आती है , लेकिन दूसरो के मुकाबले किशोरियों के लिए अधिक जोखिम पैदा करती है | आपदा के बाद की परिस्थितियों में किशोरियों की बिक्री या तश्करी जैसे खतरे बढ़ जाते है|
आपदा के समय किशोरियों की स्थिति
सर्वे में लगभग ८० फीसदी किशोरियों ने स्वीकार किया है की आपदा के बाद उनके लिए सुरक्षित आश्रय की चुनौती होती है | इसके आलावा उन्हें निजता व आत्मसम्मान के मोर्चे पर, चाहे घर में हो या राहत कैम्प में नौती का सामना करना पड़ता है | इसके बावजूद उन्हें सबसे ज्यादा जिस बात का भय सताता है, वह यह की उनकी शादी जल्दी कर दी जाएगी | इसके अलावा लगभग एक चौथाई किशोरियों ने आपदा के बाद की परिस्थितियों में बेचे जाने या तस्करी किए जाने के भय को भी स्वीकार किया | “प्लान इंडिया “ ने “आपदा के समय किशोरियों की स्थिति “रिपोर्ट जारी की है | इसमे किशोरियों पर आपदा के प्रभाव , सामुदायिक स्तर पर मौजूद सुरक्षा , उत्तरजीविता , विकास और भागीदारी का सर्वे शामिल है |
चार राज्यों में हुआ सर्वे
सर्वे के मुताविक , लगभग एक तिहाई किशोरियों ने खानपान में लैंगिक आधार पर भेदभाव किए जाने की बात स्वीकार की है | राजस्थान से तुलना करने पर बिहार ,उत्तरप्रदेश और आँध्रप्रदेश में ज्यादा असमानता पाई गई | राजस्थान ,उत्तरप्रदेश और बिहार के ७०% से ज्यादा किशोरियों और ८०% से ज्यादा किशोरों ने माना की आपदा के समय शौचालय को लेकर समस्या होती है | खाश टूर पर लडकिया ज्यादा प्रभावित होती है |
लैंगिक भेदभाव है समस्या
आपदा सभी लोगो के जीवन पर प्रभाव डालता है , लेकिन लैंगिक स्थिति के चलते लड़कियो के जीवन को अधिक प्रभावित करता है | बिहार में ४५% उत्तरप्रदेश और आन्ध्रप्रदेअश में ३५% लड़कियों ने स्वीकार किया की आपदा के समय लैंगिक भेद का सामना करना पडा | लैंगिक भेदभाव और उम्र के चलते आपदा के बाद की स्थितियों में लड़कियों के लिए खतरे बढ़ जाते है | सर्वे में शामिल सभी चारो राज्यों में शौचालयों की संख्या में कमी पाई गई है | सर्वे के दौरान केवल १७ फीसदी किशोरियों ने माना की वे शौचालयों की सुविधा का इश्तेमाल करती है | ३१ फीसदी किशोरियों ने स्वीकार किया की मासिक धर्म के निजता की कमी व अन्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है |
जल्दी शादी होने का खतरा
राजस्थान , यूपी एवं बिहार की लगभग ४० फीसदी लड़कियों ने स्वीकार किया की आपदा के समय उनके लिए खतरे बढ़ जाते है, क्योकि वे लड़को के मुकाबले कमजोर है | हालाकि आंध्रा प्रदेश में यह प्रतिशत १८ % रहा | राजस्थान में ४५% आन्ध्राप्रदेश में ५०% और बिहार में ५८% फीसदी किशोरियों ने माना की आपदा के बाद जल्दी शादी कर दी जाने का भय होता है | बिहार और आँध्रप्रदेश की एक चौथाई किशोरियों ने बेचे जाने या फिर तस्करी होने के भय को स्वीकार किया | इसके अलावा एक तिहाई किशोरियों ने माना की आपदा जैसी घटनाए लड़कियों को मनोबैज्ञानिक असर डालती है | उत्तरप्रदेश और बिहार में लड़कियों ने स्कुल और घर में शारीरिक शोषण किए जाने की बात स्वीकार की |
साभार – पत्रिका एक्सपोज –रायपुर ५.११.२०१३

पर्यावरण – कचरा प्रबंधन के नए नियमो के प्रारूप को लेकर आशंका , प्लास्टिक मिश्रित कचाराजलाने से विषैली गैसों का खतरा



पर्यावरण संरक्षक कचरा प्रबंधन के नए म्युनिसिपल ड्राफ्ट रूल्स के विरोध में है | पर्यावरण संरक्षकों का कहना है की केंर्दा ने शहरी क्षेत्रो में कूड़े – कचरे के प्रबंधन के लिए जो नियन तैयार किए है , उससे देश में कूड़ा जलाने वाले पलान्ट्स को बढ़ावा मिलेगा | यह पर्यावरण के लिए काफी खतरनाक है | पर्यावरण संरक्षकों ने नए ड्राफ्ट रूल्स को अदालत में चुनौती दी है |
म्युनिसिपल वेस्ट रूल्स २०१३ के ड्राफ्ट पर आपत्ति
पर्यावरण संरक्षकों का कहना है की केंद्र के नए म्युनिसिपल वेस्ट रूल्स २०१३ के ड्राफ्ट में रखे गए  प्रावधानों से शहरी क्षेत्रो से निकालने वाले ठोस कचरे की सफाई व् रिसाइकलिंग के बजाए “ वेस्ट एनर्जी प्लांट “ में जलाने को बढ़ावा मिलेगा | गौरतलब है की पर्यावरण विद इससे पहले कचरे की छटाई व्यवस्था को लेकर लंबा संघर्ष कर चुके है | इसमे कचरे की कम्पोष्ट खाद व रिसाइकलिंग की जा सकने वाली सामग्री के आधार पर छटनी की जानी चाहिए थी, लेकिन शायद ही कही पर कूड़े की छटनी हो रही है |
कर्नाटका हाईकोर्ट से रोक
पर्यावरण संरक्षकों को भय है की संसदीय स्थायी समिति की सिफारिसो और वैज्ञानिक समझ को दरकिनार करते हुए सरकारे इन नियमो को आधार बनाकर देश भर में कचरा जलाने वाले प्लांट्स खड़े कर देगी | गौरतलब है की कर्नाटका हाईकोर्ट ने नए नियमो को लागू करने पर रोक लगाते हुए केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को ड्राफ्ट रूल्स पर आपत्तिया आमंत्रित करने और जरुरत होने पर संशोधन करने का आदेश दिया है | हाईकोर्ट ने कहा है की लागू किए जाने से पहले नियमो को अंतिम टूर पर परखा जाना चाहिए |
अभी देश में कुल पांच प्लांट
आन्ध्र प्रदेश , दिल्ली, चंदेगढ़ , राजकोट और पुणे को मिलाकर कुछ पांच कचरा जलाने वाले प्लांट है | इन सभी प्लांट का निर्माण इस आधार पर किया गया है की वेस्ट एनर्जी प्लांट संचालित करने वाले कंपनिया कचरे से प्लास्टिक कचरे को अलग करेंगी, ताकि प्लास्टिक कचरे के  जलने से वायुमंडल में पहुचने वाली हानिकारक गैसों को रोका जा सके | हालाकि ऐसा नहीं हो रहा है , क्योकि नॅशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल के निर्देश पर जब सेन्ट्रल पोल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने दिल्ले के ओखला प्लांट का निरीक्षण किया तो पाया की मानी स्तर से कही ज्यादा डाक्सिन और फ्युरान कैंसर पैदा करने वाले तत्वों में शामिल किए जाते है |
प्रति मेगावाट १.५ करोड़ छुट
पर्यावरण संरक्षक गोपाल कृष्ण के अनुसार , देश में वेस्ट एनर्जी प्लांट की संख्या तेजी से बढ़ेगी, क्योकि केन्द्रीय नवीन एवं नवीनीकरण ऊर्जा मंत्रालय प्रति मेगावाट १.५ करोड़ रुपये का अनुदान दे रहा है | गौरतलब है की भारत में ६९० लाख तन कचरा पैदा होता है , जबकि २० फीसदी रिसाइकिल किया जाने वाला कचरा होता है | नियंत्रक महालेखाकार परीक्षक (सी ए जी ) की २००८ की रिपोर्ट बताती है की नगरपालिकाए व् नगर निगम ठोस कचरा प्रबंधन में लापरवाही बारात रही है | २४ राज्यों की ५६ नगरपालिकाओं में केवल १० फीसदी नगरपालिकाए ही कचरे की छटाई करती है , जबकि २२ फीसदी नगरपालिकाए नियमित तौर पर कचरा उठाती है
साभार – पत्रिका एक्पोज रायपुर -२.११.२०१३

यूथ चैंपियन–स्वराज संवाद

दिनांक: 22 सितंबर 2026 | माध्यम: ऑनलाइन प्रतिभागिता: 6 जिलों से 10 युवा बैठक का उद्देश्य “स्वराज के विचारों को कैसे मजबूत करें औ...