*जन जुड़ाव* अनमोल फाउंडेशन द्वारा संचालित एक ऐसा मंच है जो जमीनी स्तर किए जा रहे छोटे छोटे स्वेच्छिक प्रयासों की सफल कहानियों, शासकीय योजनाओं व जनहित से जुडी कानूनी जानकारियों को संग्रह कर प्रसारित करने हेतु तैयार किया गया है
Friday, 6 September 2024
कैट छत्तीसगढ़ ने किया संजय शर्मा का सम्मान
कन्फेडरेशन आफ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) छत्तीसगढ़ व सिटीजन कंज्यूमर एंड सिविक एक्शन ग्रुप (सीएजी) चेन्नई* के संयुक्त तत्वावधान में *विद्युत बचत व अक्षय ऊर्जा* विषय पर आयोजित कार्यशाला में *विद्युत उपभोक्ता अधिकार* के बारे में बतौर
Friday, 9 August 2024
रायपुर के पर्यावरण प्रेमियों का पानी बचाने अनोखा संदेश
मेटल पार्क रायपुर में उद्यमिता से जुड़ी महिला समूह व पुरुष साथी के साथ मिलकर पर्यावरण बचाने सतत संघर्ष कर रहे है । इन्होंने प्रकृति की ओर सोसाइटी व ग्रीन गो नामक संस्थान का गठन कर । शहर को हरा भरा करने का लगातार प्रयास कर रहे है । साथ ही पानी बचाने का भी संदेश देते नजर आए ।
पानी बंचाने का अनूठा तरीका इस्तेमाल कर संदेश दे रहे हैं जिसमे बरसात में भीगते हुए छतरी को उल्टा कर लोगों को संदेश दे रहे है कि जल को छतरी नुमा गड्ढा बना कर एकत्र कीजिए व जिस प्रकार छतरी से बून्द बून्द पानी नीचे गिर रहा है ठीक उसी तरह बून्द बून्द पानी का उपयोग कीजिए ।
यह बहुत महत्वपूर्ण संदेश है लोगों को प्रेरित करने के लिए । पानी बचाना है तो लोगो को जागना होगा और जगाना भी होगा तभी पानी संचय होगा ।
इस पर कार्यक्रम में गो ग्रीन से अलका भार्गव, तूलिका पांडेय, प्रवीण नायडू, मनीष अग्रवाल चरणजीत सिंह, लेखा पांडेय, वर्षा अग्रवाल, अमर्शा ओहरी, रेणु गुप्ता,गौरी मिश्रा, प्रकृति की ओर सोसाइटी से मोहन वर्ल्यानी जी , स्पर्श से डॉक्टर पुरुषोत्तम चन्द्राकर, अनमोल फाउंडेशन से संजय शर्मा व अन्य शामिल रहे ।
https://youtube.com/shorts/nxSIpyWnAx4?si=0Mn1YZU20yy7DZwx
Tuesday, 6 August 2024
पचास से ज्यादा किस्म के बांस का रोपण अपने नर्सरी में करके बांस को बढ़ावा दे रहे बम्बू प्रेमी मोहन
आपने वृक्ष मित्र का सुना होगा, पर्यावरण या प्रकृति प्रेमी शब्द सुना होगा। अपने नदी प्रेमी भी सुना होगा लेकिन क्या आपने बांस प्रेमी का नाम सुना है कहीं अगर हां तो कमेंट्स बॉक्स में जरूर बताइएगा ।
मैं पहली बार मिला छत्तीसगढ़ के बांस प्रेमी मोहन वर्ल्यानी जी से जो पेशे से तो इलेट्रिक सामानों के व्यवसाय से जुड़े है । लेकिन अपने व्यस्ततम समय मे से समय निकाल कर सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहते है । इसके साथ - साथ प्रकृति का प्रेम इनके सर चढ़कर बोलता है ।
इन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर *प्रकृति की ओर सोसायटी* नामक स्वैच्छिक संस्था का निर्माण कर रायपुर शहर में हरियाली लाने का बीड़ा उठाए हुए है । ये वृक्षारोपण के माध्यम से लोगों को प्रेरित कर रहे है इसके अलावा हर साल फ्लावर मेला आयोजित कर लोगों को प्रकृति से जोड़ने का हर सम्भव कोशिश करते आ रहे है । इसके अलावा आम मेला का आयोजन राष्ट्रीय स्तर का रायपुर में शासन का समन्वय लेकर करते है । इनके कार्यों को काफी सराहना मिलती है । जो भी करते है दिल से करते हैं ।
कोरोना के बाद इन्हें बांस प्रेम ने जकड़ लिया इसके लिए इन्होंने रायपुर से लगभग 20 से 30 किलोमीटर दूर दुर्ग जिले के खपरी गिरहौला ग्राम में बड़े स्तर पर 50 से ज्यादा किस्मों के बांस लाकर नर्सरी तैयार किया जो अब ढाई साल में एक बहुत अच्छा बम्बू पार्क तैयार हो गया । छत्तीसगढ़ के इतिहास में यह पहला होगा जो बांस का नर्सरी लगाया गया है । शासन के लोग इनके इस कार्य से बहुत खुश है और सराहना करते थकते नही ।
भविष्य में ये इसे एक उद्यम की तरफ देखना चाहते ताकि बांस बहुत से परिवारों का रोजगार का माध्यम बन सके । बांस की खेती के साथ साथ बांस से बनने वाले उत्पाद व उसे बिक्री के लिए एक बड़े बाजार की स्थापना हो ये इनका सपना है ।
सपने को पूरा करने के लिए दिन रात संघर्ष कर रहे है इनके इस कार्य से इनकी एक अलग ही पहचान बनी हुई है मित्र दोस्त परिवार हर कोई इनकी तारीफ करता है । यही तारीफ इन्हें मजबूती देता है और आगे बढ़ने की प्रेरणा भी ।
आप इन्हें नीचे दिए गए वीडियो लिंक पर जुड़ सके हैं
https://youtu.be/bQjg8LW_4lk?si=KvRzZG_Fp85RpKfG
Wednesday, 31 July 2024
सभी को इन्तजार है किसी नए रास्ते का अब देखते है वो रास्ता कब बनता है
जमीनी स्तर पर कार्यरत स्थानीय स्वैच्छिक संस्थाओं की चुनौतियां -भारत में सदियों से सेवा भाव का स्वरुप इतिहास में पढ़ने को मिलता है, जब देश आजाद हुआ तो बहुत से लोग बिगड़े हुए हालात को सामान्य करने हेतु मदद किए, यही तो समाज सेवा है |
अगर हम सरल शब्दों में इसकी व्याख्या करें तो वह यह की किसी भी जरूरतमंद की समय पर सहायता करना ही समाज सेवा है | पहले बिना किसी के सहयोग या लाभ के लोग सेवा करते थे जिनके पास क्षमता होती थी वे धर्मशाला, प्याऊ, कुआं, फलदार, छायादार वृक्ष आदि की व्यवस्था कर सेवा करते थे यह सेवा निरन्तर होती रही है।
बाद में सरकारे इसे कानूनी जामा पहनाने लगी या यूं कहें कि कानूनी शिकंजा कस बेेेडियो में जकड़ने का प्रयास होंने लगा । समाज सेवा को पंजीयन कराने के लिए कहा गया | फिर बाहर से आने वाली सहायता पर नियंत्रण के लिए FCRA कानून लाया गया और लेखा जोखा पर नियंत्रण करने के लिए इनकम टैक्स लेकर आए | अब संस्थाओं का एक बड़ा समय इन सब कामों में जाता है | या तो आप अपने घर से खर्च कर समाज सेवा कीजिए या अगर आप दान एकत्र कर लोगों की मदद करना चाहते है तो कानूनी पचड़े में जाइए |
स्वैच्छिक संस्थाओं की बात जब होती है तो कई नाम सामने आते
गैर सरकारी संगठन (NGO)
स्वैच्छिक संस्थाएं (VO)
सिविल सोसाइटी
अलाभकारी संस्थाएं (NPO)
बहुत सी संस्थाएं विशेषकर जो अध्ययन कर इस दिशा में कार्य शुरू की उन्होंने तो अपने आपको इसके लिए अपने आपको तैयार किया और काम पर लग गए ऐसे संस्थाओं की प्रबंधन क्षमता सशक्त होती है | और दानदाता ऐसे ही संस्थाओं को ज्यादा तलाशते है ताकि काम करते समय कोई कानून या अन्य दिक्कत न आए |
स्वैच्छिक संस्थाओं में बहुत सी विभिन्नताएं है
जन संगठन, जमीनी संगठन,ससाधन संगठन, मानव अधिकार संगठन, सामाजिक कार्यवाई समूह,सहायता समूह, नेटवर्क आदि
कानूनी पहलु देखेंगे तो
सोसाइटी ( सोसाइटी में स्वंय सहायता समूह, क्लब, स्कुल कालेज, अस्पताल व शासन के भी बहुत से अर्धशासकीय संस्थाएं है )
ट्रस्ट
कम्पनी एक्ट के तहत पंजीकृत संस्थाएं
इसी में बहुत सी संस्थाएं जो सिमित जानकारी सिमित योग्यता के साथ जमीनी स्तर पर कार्य शुरू की ऐसी संस्थाओं में अधिकाँश संस्थाओं ने अपने आपको ज्यादा तैयार नही किया | कही से भी पता चला पंजीयन कर समाज सेवा कर सकते है तो किसी तरह पंजीयन करा लिए संस्था बन गई | फिर कहीं से पता चला की इसके लिए अनुदान भी मिलता है फिर अनुदान खोजने लगे कोई कुछ भी बताया जिधर बताया उधर का ही रास्ता पकड़ लिए | इसकी बढ़ोत्तरी देख बहुत से दलाल भी बाजार में आ गए कोई कानूनी पंजीयन की बात करने लगा कोई फंड दिलाने की | ऐसे में बहुत से लोग दलालों के चंगुल में फंसे भी और शोषण भी हुआ |
जमीनी स्तर की अधिकाँश संस्थाओं की स्थिति कुछ को छोडकर जो गिनती में है –
1- आए दिन नई संस्थाओं का पंजीयन होता है जिससे संस्थाओं की संख्या बहुत है
2- सोसाइटी पंजीयन के अलावा ज्यादा जानकारी नही है कुछ गिनती की संस्थाएं है जिन्हें FCRA या इनकम टेक्स की जानकारी है
3- पंजीयन के बाद क्या करना है ये पता नही
4- दानदाताओं के सम्बन्ध में ज्यादा जानकारी नही
5- प्रोपोजल लिखने या रिपोर्ट तैयार करने में भी बहुत सी संस्थाए सक्षम नही
6- अगर कुछ छोटा छोटा काम किए भी तो उनकी दस्तावेज ठीक से बना नही
दानदाता
शासकीय परियोजनाए- शासन के परियोजनाओं तक पहुचना इतना आसान नही, अक्सर सुनने व देखने को मिलता है की ब्य्रुक्रेट्स के अपने NGOs रहते है जिन्हें ज्यादा काम मिलता है या फिर बड़ी संस्थाएं है जो राज्य के बाहर से आती है उन्हें काम मिल जाता है । लेकिन स्थानीय संस्थाओं को काम बहुत ही मिलना मुस्किल होता है। प्रोजेक्ट के लिए संस्थाओं की योग्यता इतनी कठिन रहती है कि स्थानीय संस्थाएं ऐसे भी बाहर हो जाती है। और ये सब जानबूझकर किया जाता है ऐसा मालूम होता है |
विदेशी दानदाता – विदेशी दानदाता भी सीधे जमीनी स्तर की संस्थाओं तक नही पहुंचती व बड़ी बड़ी संस्थाओं के माध्यम से नीचे आती है लेकिन वर्तमान नए FCRA कानून के कारण वो भी बंद हो गया
सी एस आर- सी एस आर फंड को तो जमीनी संस्थाएं सिर्फ सपनों में देखती है कुछ को मिल भी जाता हो उनकी संख्या ना के बराबर ही होगी |
जमीनी स्तर पर संस्थाएं
जमीनी स्तर भी कई प्रकार की संस्थाएं है जिनमे शहर के भीतर कुछ संस्थाएं चन्दा संकलित कर समय – समय पर समसामयिक मुद्दों पर कार्य करती रहती है कुछ क्लब है जो इसी तरह का कार्य करते रहते है |
अगर हम इसे देखे तो इस प्रकार विभाजित कर सकते है कि कुछ संवेदनशील लोग जो क्लब या सोसाइटी बनाकर समसामयिक मुद्दों पर कार्य करते है, ब्लड डोनेशन, वृद्धाआश्रम, एम्बुलेंस, स्वास्थ्य कैम्प, वृक्षारोपण आदि |
परियोजना आधारित संस्थाएं जो शासन से या विदेशी अनुदान, सी एस आर या अन्य स्रोतों से परियोजना के लिए धन एकत्र कर कार्य करती है एक जो स्कुल, कालेज,अस्पताल के द्वारा कार्य करती है लेकिन ये वर्ग पूर्ण आयजनक होती है इसलिए अब लोग इन्हें स्वैच्छिक में नहीं मानते लेकिन कानूनी रूप से इन्हें ये दर्जा हासिल है
चुनौतियां
जमीनी स्तर की छोटी छोटी संस्थाओं के अनेको चुनौतियां है जिनमे
1- जानकारी का अभाव कानूनी / धन प्राप्त करने के स्रोत व् उन्हें प्राप्त करने के तरीकों का
2- जानकारी का आभाव होने से उनकी दस्तावेज व्यवस्थित नही होता
3- भाषा एक चुनौती होती है विशेषकर विदेशी स्रोतों से धन प्राप्त करने के लिए
4- नया FCRA संसोधन कानून
5- आए दिन हो रहे कानूनों में संसोधन
6- संसाधन की कमी ( भागदौड़ के लिए )
7- अपने छोटे छोटे प्रयासों को सही तरीके से उचित जगह पर प्रस्तुत न कर पाना
8- शासन के समन्वय का अभाव
9- दानदाता के सम्बन्ध में जानकारी न होने व् संसाधन की कमी होने से संवाद नही कर पाते
10- संस्थागत / कार्यकर्ता स्तर पर आत्मनिर्भरता की दिशा में व्यापक सोच का अभाव
11- संस्थाओं में स्थायित्व को लेकर बहुत समस्या है
12- बिना अनुदान के संस्था कैसे संचालित हो इसके लिए व्यापक रणनीति नही दिखाई देती
13- संस्थाओं के मुदद आधारित बहुत से संगठन है लेकिन कोई ट्रेड यूनियन नही है जो
संस्था में कार्यरत मानव हितों की आवाज उठाए
अवसर
1- जमीनी स्तर पर कार्य करने के व्यापक अवसर है
2- क्षेत्रों में ग्राम स्तर पर लोगों का सहयोगात्मक रवैया होता है
3- स्थानीय संसाधनों से बहुत से कार्य किए जा सकते है
4- संमस्याएं बहुत है जहा संस्थाओं के कार्य की जरूरत है
5- बहुत से विभाग के पास संस्थाओं के साथ कार्य करने के लिए परियोजनाएं होती है
कोरोना महामारी में स्वैच्छिक संस्थाएं
पिछले समय जब कोरोना की लहर आई थी उस समय चारो तरफ अचानक लाक डाउन से स्थिति बिगड़ गई | प्रसाशन आपातकाल के लिए स्वैच्छिक संस्थाओं के सहयोग लेने के लिए जिले में सूचि बनाने में लग गए कुछ संस्थाओं ने अपना नाम दिया इसमें ज्यादात्र शहरी क्षेत्रो में कार्य करने वाले स्वैच्छिक संस्थाएं रहे |
जब मजदूर पैदल वापस अपने घरों की बढ़े और एक बड़ा दबाव का निर्माण हुआ तब बहुत से स्वैच्छिक संस्थाएं आए आए और अपने – अपने तरह से कार्य करने की कोशिश करने लगे लेकिन लाक डाउन होने से उन्हें अनुमति नही मिली तो चुपचाप जो भी कार्य कर सकती थी करते रहे कुछ संस्थाओं को शासन ने अनुमति दी लेकिन बहुतायत संस्थाओं को अनुमति नही मिल पाई | लेकिन जैसे ही लाक डाउन खुला संस्थाएं अपने अपने क्षेत्रो की तरफ भागी और जितनी व्यवस्था हो सकती थी अपने दानदाता से या अन्य स्रोतों से लोगों ने हर संभव मदद करने का प्रयास किया |
अब जब दुसरी लहर कोरोना की आई तो इस बीच बहुत से संस्थाओं के पास परियोजनाएं ही नही रही, कोई नई परियोजना ला भी नहीं सकते थे क्योकि FCRA का नया एकाउंट खोलना था जो खुला नही | FCRA के नए कानून के कारण बहुत से बड़ी संस्थाएं जो छोटे छोटे जमीनी संस्थाओं को सहयोग करती थी वे नही कर पाई तो जमीनी स्तर की बहुतायत संख्या में संस्थाएं राहत में कार्य नही कर पा रही |
सभी को इन्तजार है किसी नए रास्ते का अब देखते है वो रास्ता कब बनाता है
संजय शर्मा - सामाजिक चिंतक
( इस लेख में लेखक के अपने अनुभव व विचार)
Thursday, 30 May 2024
हर हाल में साल दर साल गर्मी बढ़ेगी -संजय शर्मा
हम बचपन से देखते आए है गर्मी बढ़ ही रही है कम नही हुआ कभी बल्कि साल दर साल बाद ही रहा है । कारण कई है जहां - जहां जंगल है वही - वही खनिज संपदा है । शासन सत्ता की नजर खनिज के दोहन पर है । कैसे करें ? दिन रात इस पर रणनीति बन रही है । विकास के नाम पर कांक्रीट का जाल सड़को के रूप में बिल्डिंगों के रूप में फैलता जा रहा है । पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हुई है सड़क बनाने के नाम पर , रेल लाइन बनाने के नाम पर और सबसे ज्यादा खदान खोदने व उद्योग लगाने के नाम पर । इतना काटा गया कि जो गांव गर्मी में ठंडे रहते थे वो भी अब गरम हो गए । शहरों में तो बिल्डिंगे ऊंची ऊची इमारतें तो बनी ही बनी साथ ही नालियों का पक्की करण कर जलस्रोतों को भूजल में परिवर्तित होने से3 जमीन के अंदर जाने से रोक दिया गया । जो थोड़े बहुत पेड़ थे उन्हें काट डाला गया । इसके साथ साथ पैसे वालों के घरों में एयरकंडीशनर ने लिया अंदर तो ठंडा कर दिया लेकिन बाहर की गर्मी को बढ़ा दिया ।
जिन क्षेत्रों में खनिज है वहां से खनिज आज नही तो कल निकालेंगे जरूर । इसके लिए जंगल खत्म होगा वे गांव खत्म होंगे जोंस क्षेत्र में बसे होंगे वे जीव जंतु खत्म होंगे जो उस क्षेत्र में होंगे ।
जंगल काट कर जंगल जंगल लगाने का फैशन चल रहा है लेकिन जितना कट रहा है उसकी तुलना में लगाया कम जा रहा है । जो लग रहा है वो सब ऐसे पौधे है जो सिर्फ इमारती लकड़ी के काम आएंगे ये जलवायु के अनुकूल नही होते है । जीव जंतु के हिसाब से ये सुरक्षित नही होते । भूक्षरण को ये रोकते नही है । पानी भी ज्यादा मात्रा में चाहिए ।
उद्योग खूब लग रहे है और उद्योगों को चलाने के लिए पानी की जरूरत होती है और इसके चलते नदियों में बैराज बना के पानी रोक कर उद्योगों को दिया जा रहा है। रेत माफिया नदियों से रेत व मील्स निकाल ले रहे है । जिससे नदी सुख जा रही है । इसका असर जलवायु पर भारी मात्रा में पड़ रहा है ।
सरकार इस दिशा में दिखावे के लिए सिर्फ योजनाएं बनाएंगी उनका अमला कुछ करेगा नही । गर्मी कम नही होगी हर साल बढ़ेगी ही । मौसम कभी भी कुछ भी बदलाव लेता रहेगा ।
Wednesday, 29 May 2024
जब सब मिलकर ही प्रकृति को नष्ट कर रहे है तो कैसे मिलेगा गर्मी से राहत
औद्योगिक क्रांति के नाम पर जो जंगलों व वनों तथा नदी का संहार हो रहा है उससे तो लग रहा है कि इस भीषण गर्मी से राहत मिलने नामुमकिन है । हां तभी कुछ सोचा जा सकता है जब देश की कम से कम आधी आबादी इस दिशा में काम करे । वनों को बचाने का, उद्योग जितने उससे ज्यादा न खुले इसकी व्यवस्था करने का, जंगलों को बचाने का , नदियों को बचाने का पानी को बचाने का, साथ ही उद्योगों से निकलने वाले कचरे गंदगी व प्रदूषण पर लगाम लगाने हैती सरकार पर दबाव बनाने का ।
सरकार से कुछ नही होगा बल्कि सरकार एक झटके में सारे किए कराए पर पानी फेर देगी। आज नही तो कल पूरा खनिज संपदा जमीन से निकाल लेंगे ये तो तय है । उसे निकालने के लिए गांव खाली कराएंगे और जंगल काटेंगे ये भी सत्य है । और सारा खनिज जंगलों के नीचे है ये भी तय है । उद्योग लगाएंगे तो उद्योगों को पानी चाहिए तो नदियों का पानी भी बेचेंगे । जहां नही होगा वह नदी जोड़ों अभियान के नाम से उस तरफ से नदी को ले जाएंगे जहां उद्योग लजे होंगे या भविष्य में लगने वाले होंगे । और वहां ले जाकर पानी को बेचेंगे ।
फैक्ट्री से जो प्रदुषण निकलेगा उसे ये कभी कंट्रोल नही करेंगे ।
लोगों को वृक्षारोपण करने व पानी बचाने के लिए अभियान चालाएँगे । खुद दोहन करेंगे उद्योगपतियों के साथ मिलकर । उनके पैसे से देश मे सरकारें चलेंगी ।
आम आदमी पौधा लगेगा सरकार काट देगी । ये निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है ।
नए जो पौधे सरकार लगा रही है ये पर्यावरण व जैव विविधता के अनुकूल नही है । ये जानवरों या पशु पक्षियों के लिए भी अनुकूल नही । ये सिर्फ इमारती लकड़ी वाले पौधे ही लगा रहे है या प्रमोट कर रहे है या सिर्फ झाड़ियां जिनका कोई काम नही । इमारती लकड़ी को को ये बाद में काट लेगे अपनी जरूरत के हिसाब से ।
अब जनता क्या करेगी ये सोचना है पौधे बचाने के लिए आंदोलन करेगी तो जेल में डाल देंगे। पौधे लगाएंगे तो कितना और कहां जमीनों पर भी तो सरकार के सहयोग से माफियाओं का ही कब्जा है ।खेती को समाप्त कर औद्योगिक क्रांति लाना चाह रहे है । तो औद्योगिक क्रांति आएगी तो पर्यावरण का बचना नामुमकिन है ।
ऊपर में बैठे रणनीति कर सैफ दोहन में लगे हैं उनका कोई इरादा नही है देश व देश की जनता के जीवन की सुरक्षा से ।
Thursday, 18 April 2024
विद्युत उपभोक्ताओं ने विशेषज्ञों से जाना विद्युत बचाने के तकनीकी तरीके
अनमोल फाउंडेशन रायपुर व सिटीजन कंज्यूमर एंड सिविक एक्शन ग्रुप चेन्नई के संयुक्त तत्वावधान में होटल किंग्सवे रायपुर में *विद्युत उपभोक्ताओं के सशक्तिकरण* विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया । जिसमें रायपुर के व्यापारी, औद्योगिक समूह के प्रतिनिधि, मीडिया प्रतिनिधि व घरेलू उपभोक्ता के साथ- साथ शासकीय विभागों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए ।
स्वागत के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए अनमोल फाउंडेशन के निदेशक संजय शर्मा जी ने क्लीन एनर्जी को बढ़ावा देने का अनुरोध करतें हुए । विद्युत उपभोक्ताओं के अधिकार पर विस्तार से जानकारी प्रदान की साथ ही विद्युत उपभोक्ता शिकायत निवारण मंच के सम्बंध में जानकारी और समस्याओं से निजात पाने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के उपयोग पर बल दिया । उन्होंने वैश्विक परिपेक्ष्य में की जा रही चिंताओं से लोगों को अवगत कराते हुए कहा कि इन समस्याओं से हम सब मिलकर ही लड़ सकते हैं अकेले कुछ भी सम्भव नही ।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए क्रेडा के सलाहकार संजीव जैन ने पीएम सूर्य घर योजना के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए कहा कि आने वाले समय मे यही भविष्य की सुरक्षा करेगा । शहर में बढ़ती गर्मी की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए उदाहरण देकर समझाया कि अगर हम छोटे छोटे प्रयास करें तो काफी हद तक समस्या पर नियंत्रण पा सकते है । जैसे अगर तापमान कम करना हो तो अपने घरों के छत को सफेद पेंट से पेंट करा दे तो घर का तापमान 7 से 8 डिग्री कम हों जाता है ।
कार्यशाला को संबोधित करते हुए कैग चेन्नई के विद्युत आडिट विशेषज्ञ किरुबाकरण ने बताया कि किस तरह के विद्युत उपकरणों का प्रयोग कर हम ऊर्जा को बचा सकते है । उन्होंने तमिलनाडु के कई सफल कहानियों का उदाहरण देकर समझाया । हैजल जी ने महिलाओं से अपील की की किचन में कम से कम विद्युत का उपयोग इसको सुनिश्चित करें महिलाएं चाह लेंगी तो यह सम्भव है कि घर के विजली बिल में कमी लजे सकती हैं ।
कंफ्डरेशन आफ इंडिया ट्रेडर्स फोरम के अध्यक्ष जितेन्द्र दोषी जी ने कार्यक्रम के आयोजन की सराहना की और पर्यावरणीय सुरक्षा तथा खनिज संपदा के बचत को ध्यान में रखते हुए विद्युत संरक्षण की बात कही तथा हर सम्भव मदद का आश्वासन भी दिया ।
प्रकृति की ओर संस्था के संस्थापक मोहन वारल्यानी जी ने जोर देते हुए कहां की जंगल, पानी व जलवायु परिवर्तन को रोकना है सुरक्षित रखना है तो हमे इस दिशा में मिलकर काम करना होगा । स्पर्श सामाजिक संस्थान के पुरुषोत्तम चंद्राकर जी ने विद्युत उपभोक्ता मंच तैयार करने और एक मजबूत संघ के गठन की बात रहते हुए बताया कि समस्याओं का निदान मिलकर ही सम्भव है जब तक हम एकजुट नही होंगे हम बड़े मुद्दों पर असरदार परिणाम नही लजे पाएंगे । निदान संस्थान के सुरेश शुक्ला जी ने लोगों को ऊर्जा के बचाव की छोटे छोटे प्रयासों को बताया और कहा कि हम इससे बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं ।
घरेलु कामगार महिला संगठन की सपना ने कहा कि इस कार्यक्रम को छोटे छोटे वार्डों व मोहल्लों में बैठकों के माध्यम से किया जाना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों की भागीदारी हो सके ।
अंत मे कैग चेन्नई के भारत राम जी ने कार्यक्रम की सफलता पर प्रसन्नता जाहिर करते हुए सभी अतिथियों व प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया व मिलकर सतत कार्य करने का आश्वासन दिया ।
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