Saturday, 21 December 2013

खेती : बीटी काटन खेती के नियमो का पालन नहीं , "रिफ्यूज बेल्ट " पर नहीं हो रही गैर -बीटी काटन की खेती

देश में जेनेटिक माडिफाइड (जी एम् )बीटी काटन के व्यवसायिक उत्पादन को मिली अनुमति को लगभग १३ वर्ष हो रहे है , लेकिन इससे जुड़े मानको का पालन सुनिश्चित नहीं हो पाया है | हाल के सर्वे में मानको के खुले उल्लघन की बात सामने आई है |
"रिफ्यूज " नियमो का नहीं हो रहा पालन
देश में ९३ फीसदी कपास बीटी काटन की खेती कर रहे है , लेकिन "रिफ्यूज " नियमो का पालन नहीं हो रहा है | हाल के एक सर्वेक्षण में पता चला है की इससे साधारण कपास की तुलना में जी एम् बी टी काटन की बिभिन्न किस्मो से अधिक पैदावार और कीटनाशको के कम इस्तेमाल संबंधी पूर्ण लाभों पर नाकारात्मक असर पडा है |" इन्डियन काउन्सिल फार एग्रीकल्चर रिसर्च "(आई सी ए आर ) के डायरेक्टर जनरल एस अय्यपन के अनुसार , बीटी काटन की आलोचनाओं को वैज्ञानिक तथ्यों के आभाव में कोई जगह नहीं मिल सकी है | देश में नौ कपास उत्पादक राज्यों में किसानो ने बीटी काटन को बड़े पैमाने पर अपनाया है | २००२ में बीटी काटन की खेती का क्षेत्रफल ५०,००० हेक्टेयर था , जो अब बढकर १०,००,००० हेक्टेयर हो गया है |
क्या है "रिफ्यूज" नियम
बीटी काटन की खेती में विस्तार के बावजूद रिफ्यूज नियम का मुद्दा बना हुआ है | रेग्युलेटरी नियमो के मुताबिक़ ,बीटी काटन वाले खेतो के चारो तरफ एक ऐसी  पट्टी होनी चाहिए , जिस पर उसी प्रजाति के गैर - बीटी काटन की खेती की गई हो | इसी पट्टी को "रिफ्यूज "कहा जाता है | रिफ्यूज में आने वाली भूमि इतनी हो की पांच पंक्तियों में गैर - बीटी काटन की खेती की जा सके या वह क्षेत्र , कुल का २० फीसदी हो |
गैर बीटी काटन बीज जरुरी
जी एम् बीटी काटन खेती के रेग्युलेशन के अनुसार ,बीटी काटन बीजो के पैकेट के साथ उसी प्रजाति के गैर - बीटी काटन के बीज का पैकेट देना अनिवार्य है , जो रिफ्यूज बेल्ट पर खेती के लिए पर्याप्त हो | हाल में पंजाब ,महाराष्ट्र और आँध्रप्रदेश में हुए सर्वे से पता चला है की किसान रिफ्यूज नियमो का पालन नहीं कर रहे है |
किसानो ने बीटी काटन खेतो में रिफ्यूज नियम के लागू न हो पाने के पीछे "एक्सटेंशन सिस्टम " की विफलता को एक बड़ा कारण बताया है | उल्लेखनीय है की एक्सटेशन सिस्टम के तहत राज्य कृषि विस्व विद्यालयों ,कृषि विज्ञान केन्द्रों और सरकारी धन से चलने वाले एन जी ओ पर नई तकनीकी के लाभों व नुकसानों के बारे में किसानो को जागरुक करने की जिम्मेदारी है |लेकिन सर्वे में शामिल राज्यों में बीटी काटन की खेती के सम्बन्ध में एक्सटेंशन गतिविधियों का अभाव पाया गया है |
लोक उद्यम नहीं है भागीदार
इस रिपोर्ट को इन्डियन सोसाइटी फार काटन इम्प्रूवमेंट के बैनर टेल किया गया है | जिसके अनुसार ,निजी क्षेत्र की तरफ से बीटी काटन के करीब ७०० तरह के बीज उपलब्ध कराए जा रहे है , लेकिन बीटी काटन को व्यवसायिक अनुमति दी जाने के एक दशक बाद भी एक भी सरकारी कंपनी बाजार में बीटी काटन उपलब्ध नहीं करा रही है | रिपोर्ट में जी एम् फसलो को लाने और राज्य की तरफ से उसके लाभों को प्रचारित किए जाने जैसे मसालों पर जन प्रतिनिधियों के ढुलमुल रवैये की आलोचना की गयी है |इस सर्वे में बतौर सह - लेखक शामिल भागीरथी चौधरी का कहना है की एक्सटेशन सिस्टम के जिम्मेदारो को नींद से जगाने और अपनी जिम्मेदारी निभाने की जरुरत है | इस सर्वे में नागपुर के सेन्ट्रल इंस्टीट्युट आफ काटन रिसर्च के पूर्व डायरेक्टर सी डी माये भी शामिल रहे है | रिपोर्ट को केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने जारी किया है |
साभार -पत्रिका एक्सपोज रायपुर १९-१२-२०१३

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