Friday, 11 July 2025

शुद्ध देशी जंगली पौधों की नर्सरी

शुद्ध रूप से देशी व जंगली पौधों की नर्सरी । परन्तु ये सभी पौधे उनके बीजों से तैयार किए जा रहे हैं। जिन्हें वनोपज कहा जाता है । इनमे कुछ फलदार पौधों के बीज भी लगाए गए है । जिनमे आम, कटहल और जामुन भी शामिल है। इसमे सबसे ज्यादा आम, कटहल और महुआ के पौधे हैं। 
इस छोटे से क्षेत्र में 1000 पौधे के लिए बीज लगाए गए है । जैसे ही ये बीज पौधे का रूप ले लेंगे। इन्हें आसपास के 10 ग्रामों में समुदायों सहभागिता से रोपण किया जाएगा । पौधे से पेड़ बनने तक के सुरक्षा व देखरेख की जिम्मेदारी समुदाय की होगी ।
जब ये फल देने लगेंगे तो समुदायों के स्वास्थ्य, पोषण व आजीविका के लिए महत्वपूर्ण साधन बनेंगे । 

Thursday, 10 July 2025

बरसात में जलाऊं लकड़ी को पारम्परिक तरीके से सुरक्षित रखते है गांव के लोग

बरसात के दिनों में जलाऊं लकड़ी की दिक्कतें होंगी इसीलिए ग्रामीण क्षेत्रों में जलाऊं लकड़ी एकत्र कर सुरक्षित रख दिए हैं ताकि ईंधन के भीगने का डर न रहे । 
आपमे जरूरत के चीजों को कैसे सुरक्षित रखना है ये बखूबी जानते हैं । क्योंकि ये ज्ञान इन्हें अपने पूर्वजों से मिला है । 
बरसात में सारी लकड़ियां भीग जाती है जिसमे आग नहीं लगता । वर्षा के पूर्वानुमान के हिसाब से पूरे बरसात भर के लिए हर परिवार जलाऊं लकड़ी संग्रहित कर अपने अपने घरों के पास सुरक्षित जगह पर स्टोर कर देते हैं ताकि बरसात के पानी मे न भीग जाएं ।

गांव में अभी भी अधिकांश परिवार लकड़ी के चूल्हे में ही भोजन बनाते हैं । इतनी महंगी गैस लेने की आर्थिक क्षमता नहीं हैं। 
इसलिए भोजन बनाने के लिए जंगलों के किनारे से सूखे जलाऊं लकड़ी एकत्र कर ईंधन की व्यवस्था करते हैं । 

Wednesday, 9 July 2025

औषधीय गुणों का भंडार है ये लाल फूल

औषधीय गुणों का खजाना है ये लाल फूल, पेट की समस्याओं के लिए किसी वरदान से कम नहीं! इसे कहीं कुद्रुम के नाम से जानते हैं तो कहीं लकरा के नाम से । नाम भले ही अलग -अलग हो लेकिन स्वाद और औषधीय गुणों से भरपूर है ये फूल ।

आपने धनिया, टमाटर और अदरक की चटनी के बारे में तो खूब सुना होगा. लेकिन, आज हम आपको एक ऐसे लाल फूल की चटनी के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसको अगर आप एक बार चख लें तो उसका टेस्ट आप कभी नहीं भूल पाएंगे.

छत्तीसगढ़ में इस फूल को खेतों में अपने फसलों के किनारे में लगाते हैं. कई जगहों पर तो इसकी भरपूर खेती करते हैं। यह फूल कई पोषक तत्वों से भरपूर है, जो की हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है.

छत्तीसगढ़ में तो इसके पत्ते की भाजी व फूलों की चटनी तथा पौधों के ताने से रस्सी बनाते हैं । कई मल्टीपर्पज उपयोग है इसका । अब इसकी रस्सी की जगह प्लास्टिक ने ले ली है । 

नई जेनरेशन इतना मेहनत नहीं करना चाहती और व्यापारी भी इतना मेहनत नहीं करना चाहते । प्लास्टिक की तरफ ही भाग रहे क्योंकि उन्हें वो आसान लगता है । जबकि प्लास्टिक पर्यावरण के लिए घातक है और ये हमारा घरेलू उद्योग पर्यावरण फ्रेंडली है । 

Sunday, 6 July 2025

देशी जामुन गरीबों को मिठास देने के साथ साथ स्वास्थ्य का भी खयाल रखते हैं

इस समय हमारे कार्यक्षेत्र के ग्रामों में देशी जामुन के फल पक कर पेड़ों पर लदे हुए हैं । ये जामुन के फल आकार में छोटे -छोटे होते हैं लेकिन मिठास में कोई कमी नही होती । पौष्टिक गुणों से भरपूर स्वास्थ्यवर्धक जामुन खाने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है 
यह जामुन शहरी जामुन से बिल्कुल ही अलग होते हैं लेकिन खाने में या स्वाद में कोई अंदर नहीं होता । पहाड़ी क्षेत्रों में छोटे -छोटे नदी नालों के किनारे तो बहुतायत में मिल जाता है। 
चिंता इस बात की है कि गांवों में मिलने वाले शुद्ध देशी फल व सब्जियां अब हाईब्रिड में परिवर्तित होते जा रही है । जिससे ये देशी फल या सब्जियां देखने को भी बड़ी मुश्किल से मिलती हैं। 
हमे विलुप्त हो रहे फल व सब्जियों को बचाना होगा और पुनः बढाने के लिए कार्य करना होगा । व्यवसायीकरण के इस युग मे वास्तव में शुद्ध चीजें मिलना मुश्किल ही नही असंभव सा हो गया है । ऐसे में अगर कुछ चीजें गांवों में बची हैं तो उन्हें संरक्षण दिया जाए ।

Saturday, 5 July 2025

पारम्परिक बीजों का संरक्षण जरूरी

अनमोल फाउंडेशन अपने कार्यक्षेत्र में पारम्परिक कृषि बीजों का संरक्षण कर उन्हें बढ़ावा दे रही है। पारम्परिक बीज चाहे वे सब्जी के हों या कृषि के सब धीरे -धीरे करके विलुप्त होते जा रहे हैं । 
ये बीज हमारे लिए बहुत ही उपयोगी है। इन्हें बचाना जरूरी है ।
हमारे पूर्वज इन्ही बीजों को रखते थे और खेती करते थे उन्हें कहीं लाइन लगाकर बीज लेने जाने की जरूरत नहीं पड़ती थी । लेकिन लालच में आकर सबने इन बीजों को नष्ट कर दिया और उन बीजों के पीछे भागने लगे जिन्हें हम बचा कर बीज के लिए नहीं रख सकते । 
पारम्परिक बीज अभी कहीं थोड़े बहुत बचे हैं तो वे हमारे जंगलों में रहने वाले आदिवासी जनजाति समुदाय के लोगों के पास ही बचे है ।
इन्होंने लालच में आकर पारम्परिक बीजों को नष्ट नहीं किया है बल्कि उन्ही की खेती करते आ रहे हैं ।
कुछ NGOs हैं जो इन बीजों को बचाने में लगे है उन्हें बढ़ाने का काम भी समुदाय के साथ मिलकर कर रहे हैं । ताकि बीज तो बचे ही साथ मे हमारा पर्यावरण भी संरक्षण हो और स्वास्थ्य अच्छा रहे ।
अनमोल फाउंडेशन भी इस पर काम कर रही है । सरगुजा जिले के 10 ग्रामों में छोटे छोटे स्तर पर इसकी खेती करा कर इसे बढ़ाने का भी प्रयास कर रही है । 

Thursday, 3 July 2025

मेहनत जब फल देने लगे

जब आपका श्रम फल देने लगे तो आपकी प्रसन्नता का ठिकाना नही रहता । ठीक इसी तरह जो पेड़ लोगों ने लगाए वो अब फल देने की तैयारी में है । इससे लोग प्रसन्न और उत्साहित हैं । 
कुछ साल पहले जब अनमोल फाउंडेशन व ग्राम अधिकार मंच के सहयोग से लोगों को फलदार पौधे लोगों को दिए गए थे उन पौधों में से सीताफल का पौधा अब फूल और फल देने लगा है। 
लोग अपनी मेहनत का फल देखकर प्रसन्न है उन्हें खुशी है कि उनका लगाया हुआ पौधा अब फल देने लगा है ।अच्छा परिणाम ही प्रसन्नता देता है । अब और पौधा लगाने के लिए प्रेरित होने लगे है। 

Tuesday, 1 July 2025

जरूरत से ज्यादा अपेक्षा नहीं इसलिए मुस्कुराते हैं

इनके चेहरों की मुस्कुराहट को देखिए । विकास और कनेक्टिविटी से कोसों दूर पर जंगलों के बीच रहने वाले लोगों के चेहरे पर मुस्कान इस बात का प्रमाण है कि ये लोग सिर्फ जीवन जीने के लिए जरूरत की चीजें की ही अपेक्षा करते हैं । जो इन्हें अपने आसपास मिल जाती हैं । 
ये लोग पीडीएस का राशन लेने 4 किलोमीटर दूर नदी पार कर जाते हैं । ग्राम में 100 परिवार रहते है। घने जंगलों के बीच बसा तुलबुल गांव बेहद ही खूबसूरत है। 
जैसा खूबसूरत गांव है वैसे ही दिलों से खूबसूरत लोग भी यहां रहते हैं । 
मेरा मिलना हुआ इन लोगों से बातचीत कर इनके बारे में जाना । कई जानकारियां हमे मिली । जो हमारे लिए नई थी । कई सुविधाएं यहां तक पहुचती ही नहीं लेकिन ये प्रसन्न हैं । मिल गया तो ठीक नही मिला तो कोई गम नहीं । 
#सीखनेकाअभियान

यूथ चैंपियन–स्वराज संवाद

दिनांक: 22 सितंबर 2026 | माध्यम: ऑनलाइन प्रतिभागिता: 6 जिलों से 10 युवा बैठक का उद्देश्य “स्वराज के विचारों को कैसे मजबूत करें औ...